प्रदीप शर्मा संपादक
प्रदेश की राजनीति में हुए अचानक परिवर्तन और नए-नवेले नेता डाॅ. मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद एक मशहूर नगमे ‘कैसे बनी सिलोरी बिना चटनी’ याद आ रहा है। कुछ लोग कह रहे हैं कि नया चेहरा लाने के फेर में पार्टी को लोकसभा चुनाव में कहीं नुकसान न उठाना पड़े। मगर डाॅ. यादव ने अपने शुरुआती तेवरों से जता दिया है कि उन पर खेला गया दाव व्यर्थ नहीं जाएगा। बहरहाल राजनीतिक हल्के से जो जानकारी छनकर सामने आ रही है उससे लगता है कि भाजपा आलाकमान ने मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री का चेहरा बदलने की पटकथा चुनाव से पहले ही लिख रखी थी, जिसे तय रणनीति अनुसार समय पर सामने लाया गया।
राजनीतिक सूत्रों के अनुसार इसमें शिवराजसिंह चौहान की महत्वाकांक्षा भी उन्हें ले डूबी। विश्लेषकों का कहना है कि शिवराज के कार्यकाल में प्रदेश में केंद्र की योजनाओं के समानांतर योजनाएं बनाकर चलाई गई जैसे – ‘प्रधानमंत्री एक्सीलैंस स्कूल’ के समानांतर यहां ‘सीएम राईज स्कूल’ शुरू कर चुनाव के ठीक पूर्व ताबड़तोड़ निर्माण कराना शरू कर दिया गया। फिर लाड़ली लक्ष्मी योजना की वाहवाही से प्रफुल्लित होकर लाड़ली बहना योजना लांच कर अपने पक्ष में विशाल महिला वोट-बैंक बनाने की कोशिशों से उनकी अति महत्वाकांक्षा साफ हो गई।
इधर नेपथ्य में रहते हुए दक्षिण उज्जैन के विधायक मोहन यादव अपने राजनीतिक गुरू कैलाश विजयवर्गीय के साथ काम करते हुए हाईकमान को यह संदेश देने में कामयाब हुए कि वे शिवराज समर्थक नेताओं की कतार में नहीं है। उन्होंने चुनाव जीतने के बाद पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा से भेंटकर अपना मत बता दिया था। वहीं पूर्व गृहमंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा के माध्यम से केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से अपनी करीबी बढ़ाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक अपना संदेश पहुंचा दिया।

सूत्रों का कहना है कि चुनाव के समय ही शिवराज को बता दिया था कि अब उनकी अगली पारी शुरू नहीं होगी। इसके संकेत स्वयं शिवराज सिंह चौहान ने अपनी कुछ आमसभाओं में दिए थे। डाॅ. यादव के पक्ष में जो बातें गई हैं उनमें जातिगत फैक्टर का यूपी-बिहार में असर, उनका सुशिक्षित होना भी बहुत काम आया। इसमें सबसे खास बात यह भी रही कि वे खांटी संघी होने से उन्हें संघ के वरिष्ठ नेता सुरेश सोनी की लाबिंग का लाभ मिला। बताया जाता है कि विधायक दल की बैठक होने के पूर्व ही उन्हें पार्टी आलाकमान की मर्जी से अवगत करा दिया गया था। और आलाकमान की तय रणनीति के अनुसार वे विधायक दल की बैठक में सबसे पीछे की कतार में बैठे रहे। जबकि कैलाश विजयवर्गीय सहित तमाम चेहरे पहली बैंच पर दिखाई दिए। इस प्रकार पार्टी आलाकमान द्वारा लिखी गई स्क्रिप्ट पर कार्य करते हुए नए सीएम चुनाव का खेला हुआ। मुख्यमंत्री बनने के बाद मोहन यादव ने सबसे पहले डाॅ. नरोत्तम मिश्रा के बंगले पर पहुंचकर उन्हें धन्यवाद ज्ञापित किया। तब आमलोगों को यह नहीं पता था कि सीएम बनाने में उनकी बड़ी भूमिका रही है।