
*ऐसा लगता नहीं कि वो अब हमारे बीच नहीं*
#प्रदीप शर्मा, हरदा
कभी भी चले आइए
इस मीडियाखाने पर
वो खरखराती आवाज,
जोर की हंसी,
और हौले से पीठ पर थपकी देने वाली शख्सियत नजर आती नहीं/
क्योंकि आपने जिस जिंदादिल इंसां के साथ कुछ पल गुजारे हैं, आज वह हमारे बीच नहीं/
सुना है मैंने भी कि
वो शख्स कहीं दूर चला गया/
फिर भी ठंडी हवा के झोंकों से उसकी खुश्बू जाती नहीं/
अभी कल ही की तो बात है जब मुझसे फोन पर कहा था बड़े जरा देख लेना, अब फोन की वो घंटी घनघनाती नहीं/
–चला गया एक पल में छोड़कर वह,
मगर कमबख्त यादें हैं जो भुलाए जाती नहीं/
–खिरकिया के मरहूम पत्रकार हाजी रफीक खान साहब को इन लफ्जों के साथ याद करना सचमुच बहुत दुखद पहलू है।
-हर छोटे-बड़े इंसां के साथ बैठकर उनके दर्द बांटना, दोस्तों को हिम्मत देना और वक्त-ए-जरूरत काम आना शायद ऐसी कई खूबियों वाले इंसां की अब दूसरी तलाश करना उसी तरह मुमकिन नहीं, जिस तरह भूसे के ढेर सुई ढूंढ पाना।
-मगर इस बड़ी दुनिया में कोई और होगा, यह नामुमकिन भी नहीं।
(स्वागत है आप सभी की राय या टिप्पणियों का)
