
प्रदीप शर्मा संपादक
हम और आप कभी-कभार निकल पड़ते हैं बाजार में यूं ही/ वहां खरीदना तो कुछ नहीं बस टहलना। फिर चलते-फिरते शान आ गई तो,
चले गए किसी बड़े माल में।
मोटा-मोटा खर्च कर बाहर निकल मूंछ पर ताव देते हुए ट्राली को धकाते बाहर आकर बड़ी शान तो बन गई। मगर माल में ज्यादा खर्च किया पैसा किस काम आया।
कभी देखें इन्हें भी-
ये तिपहिया वाहन पर जो चला जा रहा है/ वह ट्रायसिकल पर चलते हुए रोजमर्रा के उपयोग का सामान बेचने वाले इन लोगों से भी खरीदें कुछ सामान,जो जिंदा रहने के लिए सतत संघर्ष कर रहे हैं। फुटपाथ पर रेहड़ी लगाकर दिन भर में चार पैसा कमाने वाले लोग किस तरह अपना और अपने परिवार का पेट भरते हैं। जब उनसे खरीदी करें तो भाव-ताव न कर उनके इस जीवन संघर्ष के बारे में भी सोचें। चलो माना कि देश की अर्थव्यवस्था बनाने में बड़े-बड़े उद्योगपतियों की बड़ी भूमिका है। मगर फुटपाथ पर बैठकर बिक्री करने वालों का भी अहम स्थान है। गर ये छोटा-छोटा कारोबार न करें तो बड़े उद्योगों की दुकान नहीं चल पाएगी। इसलिए इनका जिंदा रहना भी जरूरी है।
