
*प्रदीप शर्मा संपादक हृदयभूमि।*
देश के झारखंड राज्य से राष्ट्रीय आदिवासी समन्वय समिति ने देश के कर्णधारों से एक अहम सवाल उठाते हुए कहा कि ‘हम अन्य नहीं, बल्कि देश के आदिवासी हैं।’ अत: जनगणना प्रपत्र में हमें अन्य न दर्शाते हुए एक पृथक पहचान दी जाए।
क्या है मामला –
राष्ट्रीय आदिवासी समन्वय समिति भारत की झारखंड स्थित रांची इकाई ने देश के आदिवासी समुदाय को एक पृथक पहचान दिलाने की मांग उठाई है। इस बारे में एक वृहद बैठक लेने पश्चात संगठन ने एक ज्ञापन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भेजा है। इसमें ‘राष्ट्रीय आदिवासी समन्वय समिति भारत’ ने कई महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं। यदि आदिवासी समन्वय समिति की मांगों को जस का तस मान लिया गया तो देश के सामाजिक और राजनीतिक मानपटल बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। बहरहाल संवैधानिक अधिकारों की मांग कर इस संगठन ने उच्च स्तर पर योजना, सांख्यिकी, समाज कल्याण सहित अनेक विभागों में बड़ी हलचल तो मचा दी है। यदि इस मुद्दे को पीएम मोदी ने गंभीरता से ले लिया तो आगामी दो-चार वर्षों तक आंकड़ेबाज नौकरशाहों को फुरसत नहीं मिलेगी।
ज्ञापन सौंपा –
विगत दिनों आदिवासी समुदाय की एक वृहद बैठक लेने बाद ‘राष्ट्रीय आदिवासी समन्वय समिति भारत’ की झारखंड इकाई रांची ने प्रधानमंत्री के नाम संबोधित एक ज्ञापन पेश किया है। संगठन ने अपनी मांगों के समर्थन में संवैधानिक अधिकारों का हवाला देकर मांगों
को जबरजस्त अंदाज में पेश धरना प्रदर्शन की अनुमति देने संबंधी मांग की है।

जंतर-मंतर में धरने की तैयारी-
“राष्ट्रीय आदिवासी समन्वय समिति, भारत” का उद्देश्य देश के विभिन्न आदिवासी वर्ग की विशिष्ट धार्मिक पहचान को बचाना है। संगठन द्वारा आदिवासी समुदाय की विशिष्ट धार्मिक पहचान व आदिवासी धर्म के सम्बन्ध की मान्यता हेतु नईदिल्ली के जंतर-मंतर मैदान में एकदिवसीय धरना प्रदर्शन किया जाएगा। इस आशय की सूचना संगठन के देवकुमार धान, शंभु उरौत, सुरेन्द्र बेटवां, शिवशंकर उराँव, सुखलाल उरांव झारखण्ड, विजय भाई, राजेन्द्र भाई राजस्थान, मंगल उड़ीसा, श्याम सुन्दर ममराम,पूरनलाल कावरे, तिलक चन्द, चन्द्रसिह बालाघाट द्वारा दी गई।
*क्या है मांगें-*
–देश में आदिवासियों के आदिवासी धर्म को क्षेत्रीय आधार पर अलग-अलग नामों से माना एवं जाना जाता है। भारत के आदिवासियों के धर्म अन्य धर्मों से भिन्न है, और धर्मों का विश्वास, परम्परा, रीति-रिवाज, जीवन चक्र, उत्पत्ति की कहानी इत्यादि अन्य धर्मों से अलग है। कथित विद्वानों ने भी माना है कि आदिवासी की धर्म विश्वास प्रणाली अन्य धर्मों से भिन्न है। वहीं अनुसूचित जनजातियों के परम्पराओं को संवैधानिक मान्यता भी प्राप्त है।
–इस भिन्नता को ध्यान में रख 1871-72 से 1951 तक हुए जनगणना में आदिवासियों को साफ-साफ अलग धर्म कॉलम में रखा गया था। (अनुलग्नक (क) देखें)
– दुर्भाग्यवश कांग्रेस सरकार द्वारा 1961 की जनगणना में लेकर 2011 की जनगणना से आदिवासियों के धर्मों को अलग कॉलम में समाप्त कर दिया। अनुलग्नक (ख) देखें।
–1961 की जनगणना से लेकर 1991 की जनगणना में गणनकों को निर्देश दिया कि संक्षिप्त रूप में धर्म को इस प्रकार लिखें
हिन्दू-हि.
मुस्लिम म
ईसाई ई.
सिख-सि
बौद्ध-बी
जैन-जै।
व अन्य धर्म के लिए पूरा नाम लिखें।
–2001 और 2011 की जनगणना में गणनकों को निर्देश दिया कि धर्म कोड इस प्रकार
हिन्दू कोड 1.
मुस्लिम कोड 2.
ईसाई कोड 3
सिख-कोड 4,
बौद्ध-कोड 5.
जैन कोड 6।
अन्य धर्म के लिए धर्म का पूरा नाम लिखें। (यहां कोई कोड न दें।)
आदिवासी समुदाय की पीड़ा-
इस प्रकार आदिवासी धर्म को “अन्य” की कॉलम में डाल दिया गया है। अर्थात आदिवासी धर्मों की पृथक पहचान को हटाकर अन्य में डाल दिया है। इससे आदिवासी धर्मावलंबी आहत और अपमानित महसूस करते हैं।
आदिवासी धर्म कॉलम को खत्म करने से इनकी अलग पहचान का एक मुख्य स्तम्भ “धर्म” पर असर पड़ा है।
*आशंका*
कई बार आदिवासी संगठनों ने शंका जताई कि जनगणना प्रपत्र में पृथक कॉलम न होने से गणना समय जब आदिवासी अपने धर्म का नाम बताता है तो गणकों द्वारा उनके धर्म का नाम लिखने के बजाए उन्हें “हिन्दू धर्म की कॉलम में डाल दिया जाता है।
–इस कारण आदिवासी वर्ग की सही गणना नहीं हो रही है। और न ही उनकी सही जनसंख्या को दर्शाया जा रहा है।
–इस कारण संविधान द्वारा संकल्पित लाभ का सही हिस्सा आदिवासियों को नहीं मिल रहा है।
*नेहरू के समय 1961 में हुआ बदलाव*
भारत के संविधान द्वारा भारत के नागरिकों को किसी भी धर्म को मानने की छूट है। संविधान द्वारा सभी धर्मों को समान मान्यता प्राप्त है। ऐसी परिस्थिति में 1961 एवं उसके बाद हुए पाँच जनगणनाओं में आदिवासियों के धर्मों के अलग कॉलम को खत्म कर अन्य कॉलम में डालने का तात्पर्य है कि भारत सरकार 1961 के बाद से आदिवासियों के धर्मों को कोई महत्व नहीं दे रही है।
–महत्व देने के बजाय भारत सरकार आदिवासियों के धर्म को अपमानित कर उसके अलग कॉलम को खत्म कर ‘अन्य’ कॉलम में डाल दिया है।
–इससे लगता है भारत सरकार आदिवासियों को दूसरी श्रेणी का नागरिक समझकर हमारी पहचान खत्म करना चाहती है।
*मुख्यधारा में लाने की साजिश ?*
संगठन ने कहा कि क्या किसी साजिश के तहत भारत सरकार द्वारा आदिवासी धर्म की पहचान खत्म कर उनको मुख्यधारा में लाना चाहती है? क्या आदिवासी को विकास करने के लिए भारत सरकार हम से ये कीमत माँग रही है कि अपना धर्म/अपनी पहचान को छोड़कर मुख्यधारा में आओ तब तुम्हारा विकास होगा।
संगठन की मांग –*
–जनगणना 2025 में आदिवासी धर्म की अलग कॉलम को बहाल की जाए और 1961 के पर्व की तरह आदिवासी धर्म को पृथक कॉलम में दर्शाया जाए।
–सरकार द्वारा अन्य धर्मों को अलग-अलग कोड यथा “हिन्दू” -1, “मुस्लिम”- 2, “ईसाई -3,
“सिख”-4, “बौद्ध” – 5, “जैन”-6 दिया गया है। इसी तरह “आदिवासी धर्म” को भी कोड संख्या-7 आवंटित कर 2025 की जनगणना की जाए।
