
# प्रदीप शर्मा संपादक।
भई वाह! गधा:राग का पार्ट 2 भी सामने आ गया है। हमारे सपा नेता ने सभी ब्राह्मणों से माफी मांग ली है और कहा कि उन्होंने तो एक कहावत का ही जिक्र भर किया था। मगर यह इतनी जल्दी पब्लिक डोमेन में आ जाएगा यह सवाल मीडिया में अभी अनबूझा बना हुआ है।
दिवस ब्राह्मण समाज पर अभद्र टिप्पणी कर एकाएक चर्चा में आए समाजवादी पार्टी के नेता राजकुमार जी भाटी को यह जानने में लगभग 2 दिन का समय लगा कि वे पीडीए के चक्कर में पार्टी का काफी बड़ा बेड़ा गर्क कर चुके हैं।
-तो जैसे ही उन्हें यह भान हुआ, उन्होंने भी ‘आव देखा-न ताव’ फौरन पत्रकारों की भीड़ बुलाकर अपने बयान का खंडन कर डाला। साथ ही कह डाला कि उनके बयान के वीडियो को कांट-छांट के साथ वायरल किया गया। इसके अलावा वे कुछ न्यूज चैनल पर डिबेट में हिस्सा भी बने।
मगर क्या इससे वो नुकसान की वापस पूर्ति कर पाए, सियासी गलियारे में यह सवाल अभी भी बना हुआ है।
-तो इसका एक ही जवाब है और वो ये कि नेताजी ने किसी कहावत का जिक्र किया भी है तो उन्होंने इसका समय गलत चुना। उत्तर प्रदेश में एक बड़ी राष्ट्रीय पार्टी का प्रवक्ता होने के नाते उन्हें यह तो अच्छी तरह पता होगा कि बड़े ओहदेदार नेता (प्रवक्ता) के शब्दों को मीडिया में कितना तूल दिया जा सकता है।
-एक ओर जब उनकी पार्टी पीडीए की उस लाइन पर चल रही हो तब बड़े ब्राह्मण समुदाय को नाराज करना कितना नुकसानदायक हो सकता है। यूपी में पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यकों को साधने के लिए बनाए गए सपाई पीडीए फार्मूले में चाहे ब्राह्मणों की गुंजाइश नहीं है। मगर पार्टी सुप्रीमों अखिलेश यादव अच्छी तरह जानते हैं कि 115 सीटों पर यह तबका निर्णायक भूमिका निभाता आया है। जबकि इस राज्य में कुल 403 सीटें ही हैं।
-इधर नेता श्री भाटी जी का खुद चुनावी रिकॉर्ड काफी खराब है। वे 3 बार विधानसभा का चुनाव हार चुके हैं। और आखिरी बार लगभग सवा लाख वोटों से हारने का भी उनका अटूट रिकॉर्ड बना हुआ है। अगली बार यदि उन्हें टिकिट मिली तो शायद वे ही इसे तोड़ पाएं। क्योंकि ब्राह्मण समाज की नाराजी उन्हें ले डूबेगी।
-वैसे नेताजी के विरुद्ध एक पुलिस थाने में एफआईआर हो चुकी है। और मीडिया में भी अभी कुछ दिनों तक लानत-मलानत का दौर चलेगा। इस दौरान शेष दस महीने का समय कटते ही यूपी में विधानसभा के चुनाव आ जाएंगे।
क्या पता तब तक पार्टी सुप्रीमों उन्हें अपनी टीम में शामिल रखें या न रखें, फिलहाल तो सियासी गलियारे में यही सवाल गूंज रहा है।