July 23, 2024 |

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लाख टके का एक सवाल क्यों फ्लाॅप हुआ इंडी-एलायंस

नेताओं की महत्वाकांक्षा और क्षेत्रीय दलों से सीट शेयरिंग में मुश्किलें ले डूबी

Hriday Bhoomi 24

प्रदीप शर्मा संपादक

  अक्सर राजनीति के पंडित और जानकार यह मान लेते हैं कि गणित के सिद्धांतों की तरह राजनीति में भी वोटों का समीकरण 2+2=4 होगा, मगर भारतीय लोकतंत्र का इतिहास देखें तो पता चलता है कि दलों में गलत गठबंधन होने से 2 और 2 मिलाकर 4 की जगह, रिजल्ट 2 और 2 बराबर 3 भी नहीं हो सकता। बल्कि कई स्थानों पर तो इनका वोटबैंक और खिसक गया। राजनीति में गणित का यह फार्मूला दलों के लिए घातक भी हो सकता है।

यही वजह है कि इस बार लोकसभा चुनाव 2024 के पूर्व समाजवादी पार्टी के चीफ अखिलेश यादव कांग्रेस से गठबंधन की दिशा अपना हर कदम फूंक-फूूंक कर बढ़ा रहे हैं। वैसे तो उनका शुरू से ही विधानसभा चुनाव और राज्य की सत्ता पाने में रुझान रहता आया है। मगर वे केंद्र में “हंग एसेंबली” बनने पर *किंगमेकर” की भूमिका का लोभ भला कैसे छोड़ सकते हैं। सो उनकेे द्वारा राज्य की 80 लोकसभा सीटों में से पहले 11 फिर जयंत चौधरी के एनडीए में जाने बाद कांग्रेस को 17 सीटोंं की पेशकश करना कोई अजूबा नहीं है।

समाजवादी कैंप का मानना है कि 2019 के चुनाव में जिस पार्टी को राज्य में एक सीट पर बमुश्किल सफलता मिली हो/ और इसके युवराज राहुल गांधी को बड़े मतों के अंतर से अमेठी में मुंह की खाना पड़ा हो, उस दल के लिए यह प्रस्ताव पकवानों से भरी थाली परोसने जैसा है।

इधर लगभग कई दशकों तक केंद्र और राज्यों की सत्ता संभालने वाली कांग्रेस आलाकमान थाली में परोसे गए टुकड़े भला कैसे स्वीकार करती थी। सो वही हुआ जैसा कि अनुमान पहले से था, राज्य में अपनी पूर्व लोकसभा सीट अमेठी पर राहुल गांधी को अकेले ही ‘न्याय’ मांगने निकालना पड़ा। इस तरह लगभग साफ है कि चुनाव से पहले ही यूपी में “इंडी एलायंस” की हवा निकल गई। अब इन सभी दलों को अपने-अपने स्तर पर चुनाव लड़ना होगा।

याद रखें कि इसके पूर्व प. बंगाल में मुख्यमंत्री और टीएमसी नेत्री ममता बनर्जी ने राज्य में कांग्रेस को एक भी सीट देने से इंकार कर साफ कह दिया कि यह पार्टी पूरे देश में 40 सीटें भी नहीं जीत पाएगी।

दरअसल इंडी-एलायंस का यह हश्र होने की पटकथा तो तभी लिखी जा चुकी थी जब इसके सूत्रधार बिहार के मुख्यमंत्री और जदयू नेता नितीश कुमार को बैंगलोर सम्मेलन में दूध से मक्खी की तरह छिड़ककर इस एलाॅयंस को कांग्रेस ने हाईजैक कर लिया। और इसे बीच में ही छोड़कर राहुल गांधी अपनी न्याय यात्रा निकालने के लिए निकल पड़े। एलाॅयंस में समन्वयक का पद भी न मिलने से नाराज नितीश कुमार के पास फिर एनडीए में जाने के सिवा दूसरा चारा भी नहीं था। इधर दिल्ली में आप प्रमुख अरविंद केजरीवाल व पंजाब में भगवंत मान ने भी सीट बंटवारे की हवा निकाल दी। वहीं बंगाल से खाली हाथ लौटते हुए असम में लुटते काफिले को बिहार में फ्लाॅप शो करने बाद यूपी में एंट्री करते-करते सपा चीफ ने भी टका सा जवाब दे दिया। 

आज राजनीतिक समीक्षकों में इस एलाॅयंस के फ्लाॅप होने को लेकर अनेक अनुमान लगाए जा रहे हैं। मगर इसका असल कारण बेमेल दलों का गठबंधन माना जा सकता है। दलीय नेताओं की महत्वाकांक्षा भी इसमें आड़े आई। साथ ही राज्यों में लुटी-पिटी कांग्रेस के साथ वहां के स्थापित क्षेत्रीय दल भला इसके साथ सीट बंटवारा कैसे करते। ऐसी स्थिति में लाख टके का एक ही सुझाव है कि अपने संगठन को मजबूत कर राज्यों में एकला चलो की नीति अपना कर कांग्रेस को उस फिनिक्स की तरह फिर से उठकर तैयार हो जाना चाहिए, जिसे लोगों ने नष्ट मान लिया था। इसमें समय तो लगेगा, मगर विपक्ष के इस अखिल भारतीय दल से भविष्य में यह उम्मीदें तो की ही जा सकती हैं।

अभी-अभी कांग्रेस से 6 वर्ष के लिए निष्कासित चिंतक आचार्य प्रमोद कृष्णन चिंता जताते हैं कि देश में यह लोकतंत्र का दुर्भाग्य है कि यहां एक सशक्त विपक्षी दल भी नहीं है। इसलिए अभी विपक्ष के ये दल सशक्त विपक्षी दल बनने का ही प्रयास करें तो यह लोकतंत्र के साथ-साथ उनके लिए भी शुभ फलदायी हो सकता है।


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