आरबीसी-आईपीसी को जोड़ प्रशासन को घेरना ठीक नहीं
ब्लास्ट घटना में आरबीसी से राहत और भादंवि के तहत आपराधिक मामला दो अलग पहलू


प्रदीप शर्मा संपादक।
फटाका फैक्ट्री में हुए भीषण ब्लास्ट में 13 मौत और एक सैकड़ा से अधिक घायलों के साथ अनेक लोगों की निजी संपत्ति क्षति देखकर नवागत कलेक्टर आदित्य सिंह द्वारा प्राकृतिक आपदा के तहत तत्काल मदद करने पर एक बार फिर “होम करने से हाथ जले” वाली कहावत चरितार्थ हो गई। एक बड़े मीडिया हाउस ने बड़ी खबर प्रकाशित कर इससे आरोपियों को लाभ मिलना बताकर सवालिया निशान लगाए हैं। जबकि किसी योजना के तहत मदद देना जिला प्रशासन के अधिकार में है। और पुलिस विभाग द्वारा आपराधिक मामले की विवेचना कर न्यायालय में पेश करना अलग मामला है।
ध्यान रहे कि घटना के ठीक बाद सिविल लाइन पुलिस ने ब्लास्ट के दोषियों के खिलाफ अपराध क्रमांक 42/2 दर्ज कर इसे भादंवि की धारा 304, 308, 34 भादवि के तहत कायम कर विवेचना में लेकर अब तक 7 आरोपियों को हिरासत में लिया है। इनके विरूद्ध इस आपराधिक मामले में न्यायालय द्वारा सुनवाई की जाएगी। मगर कुछ मीडिया हाउस पीड़ितों को राहत देने और अपराधियों पर कार्रवाई के दो अलग-अलग मामलों को साथ जोड़कर जिला प्रशासन को घेरने का प्रयास कर रहे हैं।
इनका सुझाव है कि आरबीसी 6/4 के तहत प्राकृतिक आपदा की राहत राशि से पीड़ितों को लाभ न देकर मुख्यमंत्री स्वेच्छानुदान जैसी योजना में लाभ देना था। मगर मौके पर तत्काल मदद करने में यह स्कीम कितना काम आती यह सवाल अभी गौण है। राजस्व संहिता के तहत पीड़ितों को मदद देने से घटना-दुर्घटना के आपराधिक मामल में राहत को जोड़कर देखा जाना ठीक नहीं। राजस्व और पुलिस विभाग की ये कार्रवाई समानांतर चलने से अपराधियों को लाभ मिलना समीचीन नजर नहीं आता है। हां इस तरह प्रशासन को घेरकर पीड़ित हितग्राहियों को तत्काल मदद देने में अड़ंगे जरूर लगाए जख सकते हैं। यूं भी जिला प्रशासन ने आरबीसी 6/4 के तहत लगभग 70 लाख रुपए से अधिक का लाभ अनेक कार्य करके दिया है। यह इतनी बड़ी राशि भी नहीं है कि प्रशासन की नीयत पर सवालिया निशान लगाया जा सके।
यहां बताना आवश्यक है कि पूर्व में ही मुख्यमंत्री डाॅ.मोहन यादव ने मृतक और घायलों सहित अन्य प्रभावित परिवारों को अपनी स्वेच्छानुदान निधि से मदद देने की घोषणा पहले ही की है।