
प्रदीप शर्मा, संपादक हृदयभूमि।
जानता हूं मैं, कि स्वतंत्र भारत के इतिहास में “महात्मा” गांधी की हत्या करने वाले नागरिक ‘नाथूराम गोडसे’ का नाम लेना भी एक गुनाह है।

अहिंसा के पुजारी गांधी’ के हत्याकांड बाद अचानक ये क्या हुआ कि जब वर्तमान संचार क्रांति की तरह सूचना प्रसारण के सारे स्रोत नहीं थे। तब महाराष्ट्र के कई जिलों में एक साथ इतनी मारकाट कैसे शुरू हो गई कि केवल चितपावन ब्राह्मणों को नाम छिपाकर भागना पड़ा’।
गोडसे ने अपने बयान में साफ कहा कि इस कांड के बाद मेरा, मेरे परिवार और समाज का क्या होगा। यह मुझे पता था। मगर फिर भी अखंड भारत की खातिर कुर्बानी देने के लिए कौन आगे आएगा। इसलिए यह मार्ग मुझे चुनना पड़ा।
गोडसे ने साफ कहा कि आज जो मैंने किया आने वाली दो-तीन पीढ़ियों के बाद लोगों को समझ आएगा कि ‘लाहौर से दिल्ली होकर ढाका’ तक जाने का चार किलोमीटर चौड़ा मार्ग बनने की संधि हो जाती तो आज इस भारतवर्ष के क्या हाल होते।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के इस वंदनीय दौर में जब देश, दुनिया और समाज सबकी मर्यादा लांघकर बातें कर रहे हों, तब एक लाइन तो गोडसे के चिंतन पर भी जरूरी है। वो इसलिए कि नाथूराम गोडसे एक समाचार पत्र के संपादक थे, कोर्ट ने उनकी दिमागी हालत की जांच भी कराई थी कि यह किसी पागलपन का कार्य तो नहीं था। तमाम मेडिकल जांच में पता चला कि वह दुरुस्त दिमाग के व्यक्ति थे।
इसलिए जब उनके अनुज गोपाल गोडसे के तमाम संघर्ष बाद सर्वोच्च अदालत ने भी उनके बयान को सार्वजनिक करने की अनुमति दे दी हो, तो एक बार फिर गोडसे के विचारों का जिक्र नए से क्यों नहीं किया जाए।
