
राकेश यादव गोल्डी, खिरकिया।
आजकल चारों ओर एक ही नज़ारा है – मोबाइल की स्क्रीन पर झुके लोग, हर सवाल का जवाब गूगल से और हर काम का सहारा एआई (AI) से। पढ़ने का मतलब अब सिर्फ नोटिफिकेशन पढ़ना रह गया है। अब किताबें अलमारियों में धूल खा रही हैं, और युवा पीढ़ी की सोच मोबाइल ऐप्स तक सीमित होती जा रही है। लेकिन एक सवाल बार-बार मन में आता है – “जब हम पढ़ेंगे नहीं, तो लिखेंगे कैसे?”
किताबें क्यों ज़रूरी हैं?
हम जो पढ़ते हैं, वही सोचते हैं। और जो सोचते हैं, वही हमारा व्यवहार बनता है। पढ़ने का मतलब सिर्फ जानना नहीं होता, पढ़ना हमें गहराई से सोचने, कल्पना करने और अपने अनुभवों को शब्दों में बदलने की ताकत देता है। जैसे, जब हम प्रेमचंद की कहानियाँ पढ़ते हैं तो हमें गाँव, गरीबी और इंसानियत के असली रंग समझ आते हैं। तुलसीदास और कबीर के दोहे आज भी जीवन की सच्चाई को छूते हैं। यही तो वो चीज़ें हैं जो हमारे भीतर की भाषा और भावनाओं को समृद्ध बनाती हैं।
एआई – एक मदद या एक भ्रम?
आज बहुत से दफ्तरों और संस्थाओं में एआई को आगे रखकर काम को ‘स्मार्ट’ दिखाने का दबाव है। जैसे कोई रिपोर्ट लिखनी हो, तो ChatGPT या किसी टूल से लिखवा लो। लेकिन सवाल यह है कि क्या वो आपके मन की बात कह सकता है?एआई एक औज़ार है, इंसान नहीं। वो आपकी भावनाएँ, अनुभव और संघर्ष नहीं समझ सकता। आप उसका उपयोग कीजिए, लेकिन पूरी प्रक्रिया को उसी पर छोड़ देना ठीक वैसा ही है जैसे कोई बिना पढ़े परीक्षा में नकल से पास हो जाए – ज्ञान अधूरा, सोच कमजोर।
युवा और लेखन –
आज कई युवा पूछते हैं कि “हमें लिखना सीखना है।” लेकिन जब पूछा जाए कि “क्या पढ़ते हो?” तो जवाब अक्सर होता है – “टाइम नहीं मिलता।” बिना पढ़े कोई अच्छा लेखक नहीं बन सकता। जैसे कोई कुम्हार पहले मिट्टी को समझता है, उसे गूंथता है, फिर एक सुंदर घड़ा बनाता है – वैसे ही एक लेखक पहले पढ़ता है, विचारों को गूंथता है, और फिर लिखता है।
तो फिर क्या करें?
– हर दिन थोड़ा पढ़िए। कोई कहानी, कविता, जीवनी या उपन्यास। शुरुआत किसी एक किताब से कीजिए।
– डिजिटल डिटॉक्स कीजिए।रोज़ 30 मिनट मोबाइल या इंटरनेट से दूर रहकर सिर्फ पढ़ाई या किताब के लिए समय दीजिए।
– लिखने की कोशिश कीजिए। जो पढ़ा, उस पर अपना विचार लिखिए – चाहे डायरी में हो या सोशल मीडिया पर।
– साहित्यिक संवाद में भाग लीजिए। स्थानीय पुस्तक मेलों, पुस्तक चर्चा या लेखन कार्यशालाओं में शामिल हों।
जब किताबें कम पढ़ी जाती हैं, तो सवाल भी कम होते हैं। सोचिए, अगर कोई बच्चा कभी अपने गाँव से बाहर न निकला हो और उसने कोई किताब न पढ़ी हो, तो वो दुनिया को कैसे समझेगा? उसे कैसे पता चलेगा कि कहीं औरतें बराबरी से स्कूल जाती हैं, या कोई ऐसा देश है जहाँ लोग बिना डर के अपनी बात कहते हैं? किताबें हमारे सोचने की ताकत को बढ़ाती हैं।
जब हम भीमराव अंबेडकर की ज़िंदगी पढ़ते हैं, तो हमें समझ आता है कि शिक्षा कैसे बदलाव लाती है। या जब हम ‘अन्ना भाऊ साठे’ की कहानियाँ पढ़ते हैं, तो ये साफ़ होता है कि एक साधारण इंसान भी समाज को हिला सकता है। लेकिन जब पढ़ना बंद हो जाता है, तो हमारे मन में सवाल उठना भी बंद हो जाता है। फिर हम जैसा देख रहे हैं, वैसा ही मान लेते हैं। जो कहा जा रहा है, उसी को सच मान लेते हैं। यही तो खतरा है – बिना सवाल के समाज चलने लगे, तो बदलाव कैसे होगा?
अंत में –
किताबें सिर्फ ज्ञान नहीं देतीं, वो हमें इंसान बनाती हैं। जब समाज में किताबें कम पढ़ी जाती हैं, तो सवाल कम पूछे जाते हैं, और जब सवाल कम होते हैं, तो बदलाव भी कम होता है। एआई को अपनाइए, लेकिन किताबों को मत भूलिए। एआई आपकी मदद कर सकती है, लेकिन आपकी सोच नहीं बन सकती और सोच वही पक्की होती है, जो पढ़कर, समझकर, जी कर बनी हो।
लेखक परिचय – राकेश यादव ‘गोल्डी’
इस लेख को राकेश यादव ‘गोल्डी’ ने लिखा है, जो सामाजिक बदलाव और समकालीन विषयों पर गंभीर विचार रखते हैं। यह लेख दीपक जी से हुई विस्तृत चर्चा और उनके अनुभवों के आधार पर तैयार किया गया है। राकेश यादव ‘गोल्डी’ लंबे समय से सामाजिक कार्यों, युवाओं के नेतृत्व, और तकनीक के समाज पर प्रभाव जैसे विषयों पर काम कर रहे हैं। उनकी लेखनी समकालीन मुद्दों को न केवल उजागर करती है, बल्कि उनके गहरे विश्लेषण के माध्यम से पाठकों को नए दृष्टिकोण से सोचने के लिए प्रेरित भी करती है।
