# विप्र समाज : अनेक चुनौतियों का सामना कर रही समाज की उपजातियां
समाजोत्थान की दिशा में कहीं से भी हो एक दीप जले

प्रदीप शर्मा संपादक।
देश एवं प्रदेश में वर्तमान समय में ब्राह्मण समाज की लगभग सभी उपजातियां (या श्रेणियां) अनेक चुनौती का सामना कर रही हैं। यदि समाज ने आर्थिक व सामाजिक चुनौतियों को गंभीरता से नहीं लिया तो निकट समय में अस्तित्व का संकट उत्पन्न होने की आशंका है।

*समस्या को जानें विस्तार से –*
देश एवं प्रदेश में खासकर महानगरों में ब्राह्मण समाज की युवा पीढ़ी बड़ा संघर्ष कर रही है। पिछली आर्थिक गणनाओं और सर्वेक्षणों में जो तथ्य निकलकर सामने आए हैं, उससे साफ पता चलता है कि आज के दौर में आर्थिक रूप से मुस्लिमों के बाद ब्राह्मण सबसे पीछे हैं। देश एवं प्रदेश के ग्रामीण व हरदा जैसे मध्यम शहरी क्षेत्रों को छोड़ दिया जाए तो वृहत-महानगरों में विप्र परिवारों के अनेक युवा होटल, रेस्तरां और घरों में खलासी काम करते देखे जा सकते हैं। – क्योंकि इनके पास न तो कोई अच्छी नौकरी है और न ही ढंग का रोजगार। ब्राह्मण परिवार से होने के कारण ये न तो सैलून चला सकते हैं और न ही ड्रायक्लीन की दुकान, चरणपादुका की मरम्मत या पाॅलिश का काम तो ये कभी कर नहीं सकते। इसी प्रकार एक समस्या सामाजिक भी है। जिनका निराकरण समाज को ही करना होगा।
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*… तो गंगा नहा लिए –*
यह देखने में आया है कि आर्थिक संकट के दौर में विप्र समाज के लोग अपनी आजीविका के साथ-साथ बच्चों के रोजगार और विवाह के बारे में चिंतित हैं। हमने कई बार इन लोगों को यह कहते देखा और सुना है कि बेटे की अच्छी सी नौकरी लग जाए और बिटिया का विवाह हो जाए तो गंगा नहा लिए।
– इधर नित बिगड़ते हालातों के चलते हमारी युवा पीढ़ी उचित संबल न मिलने से राह भटकने लगी है। वहीं बच्चियों को अच्छे रिश्ते न मिलने से हमें यहां-वहां अप्रिय खबरें देखने व सुनने को मिल जाती हैं।
*तो समाज को ही करना होगा पहल-*
विप्र समाज के प्रबुद्धजनों को यह अदना सा लेखक कोई सुझाव दे पाए, ऐसा सोचना मेरे लिए संभव नहीं। मगर इन बातों को लेकर कुछ विचार मेरे मनोमस्तिष्क में रह-रहकर घुमड़ कर आते हैं कि संपूर्ण विप्र समाज के समक्ष आई इन समस्याओं का निराकरण सरकारें नहीं कर सकती। और न ही लोग किसी का भला करने आगे आएंगे। आज भी लोग अपना और अपने परिवार से अलग हटकर औरों का नहीं सोच पाते हैं। इसके लिए समाज के उपजाति संगठन भी कर पाएं तो वह कुछ हजार लोगों तक ही सीमित रह सकता है। ऐसी स्थिति में हमें अपने सर्वब्राह्मण समाज के माध्यम से पहल करें तो समाज और उपजातियां सभी का भला होना मुमकिन है। इसलिए हमें अपने उपजातिगत सामाजिक रीति-रिवाज और परंपराओं को निभाने के साथ वृहत विप्र समाज के हितार्थ कुछ पहल करना होगा। “अंधेरा खत्म करने की शुरुआत कहीं से भी हो मगर एक दिया जलना ही चाहिए।”
सबसे पहले सामाजिक समस्या –
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में समाज में अच्छा घर-परिवार देखने की तलाश में लोग यह भूल जाते हैं कि बेटियां कब बुढ़ाने लगी हैं। आपको बता दें कि हम यहां उपजातियां खंडित करने की सलाह नहीं दे रहे। मगर यह भी ठीक नहीं होगा कि अच्छे रिश्ते न मिलने से निराश लड़कियां ‘गैर’ के साथ चली जाएं। मीडिया में आजकल ऐसी अनेक खबरें हमारे सामने आती रहती है और हम देख-सुनकर उसे भुला देते हैं।
फिर क्या करें –
यहां आलेखक का सुझाव है कि उपजाति में अच्छे वर की तलाश से थके लोग अपने सर्वब्राह्मण समाज की “मैट्रीमोनियल मैग्जीन” का सहारा ले लें, जहां ऐसे उपजाति बंधन न मानने वाले परिवार अपने बेटे-बेटियों के बायोडाटा भेज सकते हैं। यदि समाज द्वारा ऐसी Matrimonial Magzene का प्रकाशन किया जाए तो ब्राह्मण समाज की बेटियों को गैर परिवारों में जाने से बचाया जा सकेगा। इसलिए घटते लिंगानुपात के बीच समाज की बेटियों को नए संकट से बचाना जरूरी है।

*आर्थिक समस्या कैसे हल हो–*
हमारी सामान्य पढ़ी-लिखी पीढ़ी के सामने असल समस्या तो यह है कि उसके पास सरकारी नौकरी या बड़ी कंपनियों में जाॅब नहीं है। उसकी माली हालत ऐसी है कि वह बड़ा धंधा-रोजगार नहीं कर सकता। इसके नतीजन उसे होटलों, रेस्तरां व बड़े घरों में खलासीगिरी करना ही एकमात्र चारा है। यहां सवर्ण समाज के लिए सरकारी योजनाओं के द्वार लगभग बंद हैं। इस कारण नई पीढ़ी को बचाने समाज को सामने आना पड़ेगा।
वित्तीय संस्था की पहल-
इसके लिए कंपनी एक्ट के तहत वित्तीय संस्था पंजीयन कराकर एक छोटी बैंक (महाकोश) स्थापना की जा सकती है। इसके लिए समाज की मासिक बैठक में हर परिवार से नियमित 100-50 या 20 रुपए स्वेच्छानुदान मिले तो हर माह 10 हजार रुपए जमा कर साल भर में सवा लाख जमा हो सकते हैं। इससे समाज का यह ब्राह्मण बैंक (महाकोश) हर साल समाज के एक युवा को बिना ब्याज पर ऋणानुदान कर उसे नई राह दिखा सकेगा। इस राशि से वह हितग्राही रोजगार लगाकर प्रतिदिन 100 रुपए की किश्त जमा कराएं तो महाकोश कभी खत्म नहीं होगा। छोटे स्तर पर यह दैनिक प्रीमियम जमा होने से महाकोश की पूंजी खत्म होने का खतरा भी नहीं रहेगा।
*बड़ी शुरुआत सदैव छोटे स्तर से होती है *
अपने महर्षियों के आशीष से इस वित्तीय कंपनी का पूरा काम कंपनी एक्ट अनुसार पारदर्शी ढंग से चला तो कुछ दिनों में यह बड़ी बैंक बन सकेगी। स्वेच्छानुदान करने वालों को वित्तीय कंपनी 2% ब्याज देकर उनकी राशि में जोड़कर प्रोत्साहित कर सकती है। उनका यह शेयर (स्वेच्छानुदान) राशि डबल होने पर डिबेंचर में तब्दील कर ब्याज की राशि बढ़ा सकते हैं। सब बैंकिंग और कंपनी रूल अनुसार चलाकर हम युवाओं को रोजगार में मदद कर स्थिति में काफी सुधार ला सकते हैं। मेरा मानना है कि सरकार के भरोसे पर बैठने की अपेक्षा सामाजिक स्तर पर ऐसी समस्याओं का निराकरण किया जा सकता है।
*सबको शेयर करें यह विचार-*
हमारे इस विचार पर आप सभी सामाजिक बंधु चाहें तो वेबसाइट पर अपनी राय दे सकते हैं। और चाहें तो समाज की बैठक में इस पर चर्चा कर Matrimonial magzene तथा Bank की शुरूआत कर सकते हैं। इससे समाज के संगठन पर कोई भार आने की गुंजाइश नहीं है।
*इसके साथ ही हमारा सुझाव है कि इस आलेख को आप अपने सामाजिक बंधुओं में शेयर कर दें ताकि कहीं से कोई नया सूरज निकले और अंधेरा लुप्त हो।**
(सभी फोटो साभार)
(इन सुझावों के पीछे लेखक का कोई निजी स्वार्थ नहीं है, ये केवल सुझाव भर हैं)
