April 22, 2026 |

#विजय का पर्व : तो क्यों न हो एक और पर्व पुलिस के नाम

मगर यह आयोजन अपने पीछे कई सवाल छोड़ गया

Hriday Bhoomi 24

प्रदीप शर्मा संपादक हृदयभूमि।

मुख्यमंत्री जनकल्याण अभियान में  पुलिस मुख्यालय के आदेशानुसार जिला मुख्यालय पर भारतीय सेना के ऐतिहासिक शौर्य का विजय पर्व मनाया गया। इसमें पुलिस बैंड ने शानदार प्रस्तुति देकर राष्ट्रप्रेम के तरानों से लोगों में देशभक्ति की बयार बहाई। मगर यह आयोजन अपने पीछे ऐसे कई सवाल छोड़ गया है कि जिनके जवाबों की आज बड़ी जरूरत है। सीमा पर जहां हमारे सैनिक देश की रक्षा में अपना खून बहाकर प्राणों की आहुति दे देते हैं। वहीं मुल्क के भीतर देश के दुश्मनों से निपटने का काम हमारी पुलिस के जवान करते आए हैं। हमारे पुलिस बल में ऐसे अनेक जवानों का योगदान है जिन्होंने जनसुरक्षा के कार्य में कुर्बानी दी हैं।

क्यों न मने पुलिस का शौर्य दिवस –

यहां सेना के शौर्य और बलिदान से हम पुलिस विभाग की चुनौतियों की तुलना नहीं कर रहे हैं। देश के पूर्व थल सेनाध्यक्ष एवं पहले मुख्य सुरक्षा स्टाफ (सीडीएस) विपिन सिंह रावत ने एक कार्यक्रम में कहा था कि हमारा देश तीन स्तर पर चुनौतियों से जूझ रहा है। पहली देश की सीमा पर, दूसरी विदेशों में बैठे दुश्मन और तीसरी चुनौती देश के भीतर सक्रिय चुनौतियों से जूझ रहा है। ज्ञातव्य रहे कि यही तीसरी चुनौती देशविरोधी ताकतें हैं जो मुल्क को खोखला करने में लगी हैं। इसलिए छिपी हुई इन गुमनाम ताकतों का पता लगाना और उनसे जूझने वाली एजेंसियों का महत्व बड़े मायने रखता है।

ठीक बात है कि मुल्क की सरहदोंं पर भीषण सर्दी और बारिश सेे भरी घनघोर अंधेरी रातों मेंं जान हथेली पर लेकर भारतीय सेना के जवानोंं ने अनेक शहादत दी हैं। मगर देश के भीतर कानून व्यवस्था के दुश्मनों से मोर्चा लेने वाले पुलिस जवानों को भी साल में एकाध बार याद करना जरूरी है।

हेमंत करकरे मुंबई व खंडवा के हेडकांस्टेबल –

यदि संक्षेप में ही कुछ घटनाओं का जिक्र करें तो पता चलता है कि देश के भीतर छिपे मुल्क के दुश्मनों का पता लगाना और उन पर कार्रवाई करना जरा मुश्किल। लगभग दो दशक पूर्व देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में पड़ौसी मुल्क के इशारे पर हुए आतंकी हमले में आतंकवादियों से मोर्चा लेकर किस तरह लोगों को बचाकर महाराष्ट्र पुलिस के इंस्पेक्टर हेमंत करकरे ने अपनी जान गंवाई थी।

इसी प्रकार हमारे मध्यप्रदेश में सक्रिय एक आतंकवादी संगठन को नेस्तनाबूद करने में किस तरह पुलिस जवानों ने खरगोन, बुरहानपुर और खंडवा में जान जोखिम में डालकर मोर्चा लिया था। यह भी विचारणीय है कि प्रदेश को नक्सली मुक्त बनाने में हमारे पुलिस ने खरगोन, रायपुर बिलासपुर और बस्कखरगोन, रायपुर बिलासपुर और बस्तर जिलों में कब-कब बड़ी कुर्बानियां दी हैं।

मगर सीडीएस के पूर्व सीडीएस के अनुसार देश के भीतर मौजूद दुश्मनों का पता लगाना और उसे खत्म करना बड़ा मुश्किल काम है। क्योंकि यहां पर बल को स्थानीय स्तर अनेक चुनौतियां आती हैं। जिनके चलते उनका योगदान याद नहीं किया जाता।

इसलिए क्यों न हो एक विजय पर्व हमारी पुलिस व्यवस्था के उन जवानों के नाम जो गुमनामी के अंधेरों में खो जाते हैं कहीं।


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