
प्रदीप शर्मा संपादक
एक बेशरम का पेड़ अगर होता अपने नदी के भी तीरे !
मगर अब यह इस सृष्टि पर नहीं रहा, अब यह लुप्त सा होने लगा है।
कभी सोचता हूं कि मैं कुछ कहूं…
कभी सोचता हूं कि मैं चुप रहूं।
मगर आज हमें चुप नहीं रहना है।
– याद है वह प्राकृतिक वनस्पति जिसे कुछ स्थानों पर हमने बे-हया और कहीं बेशरम कहकर पुकारा है।
अपने आसपास नदी, तालाव और पोखरों के समीप अपने आप उपजने वाली यह वनस्पति अब लुप्त होने लगी?
– मजेदार बात यह कि इस वनस्पति को लगाने के लिए इंसानों ने न तो कोशिश की और न फिक्र
बस यह अपने आप कहीं भी पनप जाती है बिंदास और बेफिकर
इसे न तो मौसम की जरूरत है और न ही किसी देखभाल की। इसलिए इसे मतलबी इंसानों ने बेशरम या बेहया कहकर पुकारा।
– याद रखें कि कुछ भी काम न आने वाली इस वनस्पति के दूध से हम अपने घाव सुखाते हैं। तमाम चर्मरोगों में भी यह बड़े काम आती है।
# मगर दुखद बात यह कि अपने आप जन्म लेकर स्वयं पनपने वाली यह वनस्पति अब रासायनिक खेती या अन्य कारणों से धीरे-धीरे लुप्त होने लगी है।
मित्रों इसे भी बचाएं
काश अगर होता बेशरम का पौधा
अपनी नदी के तीरे
फिर यह इंसान भी अपने-अपने मतलब के तीरे इठलाता।