#महाकुंभ प्रयागराज : होती हैं महिला भी नागा संत, लगा महा-तपस्वी नागाओं का रैला
करते हैं कठोर तपस्या, सहते हैं कष्ट और याद करते शिव को

प्रदीप शर्मा संपादक हृदयभूमि।
144 वर्ष में आने वाले प्रयागराज के इस महाकुंभ प्रयागराज में महा-तपस्वी नागाओं का रैला हुआ है। यहां कई वर्षों तक हिमालय की कंदराओं में रहकर नागा साधु अदभुत तपस्या करते हैं। इन्हें अनेक साल तक सार्वजनिक जीवन में कोई और कहीं भी नहीं देख पाता। कौन हैं ये नागा और इसके बाद हम चर्चा करेंगे अघोरियों की जो हमारे आसपास कहीं ओर दिखाई ही नहीं देते हैं।
कौन और क्या हैं नागा संत-
नागा साधुओं की बात करेंगे तो आम लोगों के मन में सामान्य रूप से यह विचार आता है कि बिना वस्त्र के रहने वाले साधु। मगर नागा साधुओं की तपश्चर्या के बारे में शायद ही किसी को जरा भी ख्याल आए कि वे सामाजिक जीवन से दूर इसी अवस्था में किस प्रकार ठंड, गर्मी और भरी बारिश में पूर्ण स्वस्थ रह अपने आराध्य का ध्यान करते हैं। कभी-कभार कुछेक नागा संत चोला धारण कर कंदराओं में निवासरत संतों के लिए आ जाएं तो यह दर्शन करना भी दुर्लभ।
आइए हम सुनाते हैं कुछ अनकही कहानी –

कौन और क्या हैं नागा संत-
नागा साधुओं की बात करेंगे तो आम लोगों के मन में सामान्य रूप से यह विचार आता है कि बिना वस्त्र के रहने वाले साधु। मगर नागा साधुओं की तपश्चर्या के बारे में शायद ही किसी को जरा भी ख्याल आए कि वे सामाजिक जीवन से दूर इसी अवस्था में किस प्रकार ठंड, गर्मी और भरी बारिश में पूर्ण स्वस्थ रह अपने आराध्य का ध्यान करते हैं। कभी-कभार कुछेक नागा संत चोला धारण कर कंदराओं में निवासरत संतों के लिए आ जाएं तो यह दर्शन करना भी दुर्लभ।
आइए हम सुनाते हैं कुछ अनकही कहानी –
‘नागा’ शब्द सुनना और किसी के रहने की बात सुनकर किसी भी सामान्य वस्त्रहीन रहने की कहानी लगे तो वे अभी इस ग्रुप से लेफ्ट हो जाएं। क्योंकि इतनी कठिन तपश्चर्या की बात ही सुनना मुश्किल है। यह सनातन धर्म के वो रखवाले हैं, जिन्होंने तमाम वेद, उपनिषद और पुराणों को अपनी स्मृति में रख, वाचिक परंपरा से सदैव जीवित रखा है। यह ज्ञान की वह थाती है जो हमारे ऋषि-मुनि अनेकानेक वर्षों से संभाले चले आए हैं।
इस परंपरा को निभाने वाले संतों का जिक्र हम करेंगे आगे और… तब तक आप सभी प्रयागराज के महाकुंभ का आनंद उठाएं। यह 144 वर्ष में एक बार ही आता है।