
प्रदीप शर्मा हरदा।
बचपन में दादी-नानी से सुनी थी कहानी, एक थे आयराम दूसरे थे गयाराम। इस कहानी का सार यह है कि एक आयाराम के आने से कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि दूसरा गयाराम जाने के लिए तैयार बैठा है। इसलिए नए आयाराम के चक्कर में कहीं अपने दूसरे राम को ‘गया-जी’ न दिखा दें। मतलब साफ है कि अपने घर-परिवार और कुटुंब को बचाए रखें, अन्यथा कोई एक विभीषण जाकर राम के पाले में न बैठ जाए।
– बहरहाल विभीषण वाली यह कहानी हरदा विधानसभा चुनाव दौरान काफी हिट हुई थी। तब जाने वाले गयाराम अपनी मां-स्वरूपा पार्टी छोड़ते समय काफी दुखी भी हुए थे। मगर इसे छोड़ने के बाद उन्हें नए दरबार का रागरंग शायद नहीं जंचा। या शायद उनका मकसद अपने दुश्मन भ्राता की नाभि में राम का बाण लगवाने तक ही था। यह सब समय और क्षेत्रीय राजनीति के इतिहास में दर्ज हो गया।
– अब हम नए दौर में दादी और नानी वाली कहानी पर वापस लौटें तो पता चला कि गयाराम जी को मिला नया दरबार असल राम का नहीं था। सो विभीषण जैसे धार्मिक पुरुष वहां एक पल भी कैसे बिताते।
सो दरबार के तमाम शिरोमणि नेताओं के आगमन पर वहां खुशी से दांत निपोरते नहीं गए। क्यों, क्योंकि मां का वह दुलारा आंचल कहीं और नहीं मिलेगा। सो अब आगेे आगे क्कआगे क्याा आगे क्या खेला होगा कुछ कहना मुमकिन नहीं। फिर भी राजनीति में कुछ भी होना असंभव नहीं होता।
– देखने में आया है कि पूरे देश की राजनीति में इनदिनों बड़ी हलचल के साथ भागदौड़ मची हुई है। इसलिए यहां भी कौन, कहां और कब नजर आए, बाद में मत कहना, तब तक के लिए नमस्कार।
Disclaimer : this rticle does’nt related with Harda politics.
