April 25, 2026 |

पुण्य स्मरण : भूदानी कार्यकर्ता और स्वतंत्रता सेनानी महादेव पगारे

सहूलियतें पाने कभी फ्रीडम फाईटर सूची में नाम नहीं लिखाया

Hriday Bhoomi 24


इटारसी। एक विरले और अद्भुत आंदोलन के सिपाही स्व. महादेव पगारे की अब स्मृति शेष है। 15 मई 1986 को उनका देवलोकगमन हुआ था। नगर एवं जिले के स्व. पगारे ने स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भागीदारी के बावजूद स्व. संग्राम सैनानियों की सूची में नाम जुड़वाने या सरकारी सहूलियत पाने का कोई प्रयास नही किया।

20 जनवरी 1923 को जन्मे और अभावग्रस्त स्थिति में 1938 तक खंडवा में रहकर स्व. पगारे ने 8 वीं तक शिक्षा प्राप्त की। 1939 में वह अपने बड़े भाई स्व. श्री सुकुमार जी पगारे के साथ इटारसी में आकर बस गये। आगे की पढ़ाई के लिए इटारसी म्युनिस्पल स्कूल में प्रवेश लिया लेकिन आजादी के दीवाने को स्कूल रास नहीं आया और 31 दिसम्बर 1939 को स्कूल त्याग दिया ।
महादेव पगारे को अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जनमत तैयार करने के लिये पंपलेट छापने और रात्रि के तीसरे पहर खुफिया तरीके से स्वयं अपने हाथों से चिपकाने तथा बाहर भेजने में महारथ हासिल थी। इस काम को उन्होंने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के शंखनाद के समय बखूबी अंजाम दिया।
आज भी उनके परिवार के पास पीतल का वह गंजा मौजूद है, जिनमें ब्लाकों को काले मिट्टी के तेल में रखते थे, यह तेल काला होने से अंग्रेज उसमें हाथ नहीं डालते थे। अंग्रेजी पुलिस अनेक बार महादेव पगारे पकड़कर थाने ले गई लेकिन सबूत के अभाव में छोड़ना पड़ा। तब द्वारकाधीश मंदिर की दुकानों में राष्ट्रीय प्रिंटिंग प्रेस था। जहां आजादी के  पोस्टर छपते थे। वह स्वयं अपने हाथों से कंपोज करके प्रेस चलाकर रात-रात भर पोस्टर छापते थे। इसी दौरान उन्हें अस्थमा की बीमारी ने अपने गिरफ्त में ले लिया और आर्थिक तंगी से  1950 के आसपास प्रेस बंद हो गई।
बड़े भाई स्व. श्री सुकुमार पगारे भी पंडित नेहरू के अनुरोध पर आदिवासियों के बीच कार्य करने आसाम चले गये 1956-57 में श्री पगारे ने गांधी आश्रम खादी भंडार में मैनेजर के पद संभाला। उन्होंने जिले में खादी भंडार खोलने के भागीरथी प्रयास किए। उन पर आचार्य कृपलानी महात्मा गांधी, पं. नेहरू, जयप्रकाश नारायण एवं विनोबा भावे के इटारसी प्रवास एवं भाषणों का गहरा प्रभाव पड़ा था।
समाजवादी पार्टी, कांग्रेस पार्टी तथा लाल सेना के कार्यकर्ता के रूप में महादेव पगारे की पहचान थी। उनके जीवन की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने खादी पहनना, औड़ना, बिछाना शुरू किया और मृत्युपर्यन्त (15 मई 1986) खादी को नहीं छोड़ा।


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