#संदर्भ इटारसी : एक ग्रंथ ही नहीं, बल्कि गागर में सागर है
एक मानव बस्ती से बड़े शहर में तब्दील होने की कहानी

प्रदीप शर्मा, संपादक
अमीबा की तरह बढ़ती मानव बस्ती के बड़े शहर बनने की कहानी को किताब रूप में आकार देना कोई सामान्य पुरुषार्थ नहीं है। मध्य रेलवे के सबसे प्रमुख जंक्शन इटारसी के जन्म से लेकर आधुनिक शहर बनने का सफर निर्विवाद रूप से लिपिबद्ध करना तब और भी मुश्किल है, जबकि प्रामाणिक जानकारी के लिए लेखक के पास गजेटियर से भी संपूर्ण जानकारी का सहारा न हो। लंबे समय से गजट बनाने का काम बंद होने के बावजूद इसे लिखने का बीड़ा उठाकर अपने शहर की दास्तां लिखना दुष्कर अवश्य है। मगर नर्मदापुरम जिले के वरिष्ठ पत्रकार और समाजसेवी नागरिक प्रमोद पगारे ने यह बीड़ा उठाकर अपनी टीम के साथ परिश्रम कर तीन वर्ष के समय में आकार दिया है।

– आज जब उनकी मेघा और परिश्रम से बनी कृति हमारे सामने “संदर्भ इटारसी” के रूप में सामने आई, तो मन में बड़ी जिज्ञासा थी कि इसमें किन-किन बातों और उपलब्धियों का जिक्र मिलेगा। बीते लगभग 600 साल में यहां लोगों ने किस तरह पुरुषार्थ कर अपने शहर को देश एवं मध्य प्रदेश के अग्रणी नगरों की कतार में पहुंचाया। जब इसकी दास्तां हम पढ़ेंगे तो वह कैसी लगेगी। ऐसे मनोभावों में डूबकर “संदर्भ इटारसी” देखने को मिली तो मुझे लगा कि यह ‘गागर में सागर’ संजोने का अनुपम प्रयास है। यदि इस किताब को मैं ‘ग्रंथ’ की संज्ञा देना चाहूं तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। स्मरणीय रहे कि पत्रकारिता जगत में एक सदप्रवृत्ति यह देखने को मिली है कि यहां के लगभग हर विख्यात पत्रकार ने सेवानिवृत्त होने पर किसी किताब का सृजन अवश्य किया है। ख्यात पत्रकार कुलदीप नैयर ने इमर्जेंसी नामक किताब लिखी तो अरुण शौरी और अन्य ने भी किताबों पर हाथ आजमाया है।

– ठीक इसी तरह नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद पगारे भी अब तक आधा दर्जन किताबों का सृजन कर चुके हैं। वे ऐसे हर उस कार्य के लिए पहचाने जाते हैं जो मुश्किल होते हैं। मगर इसका बीड़ा उठाकर आने वाली पीढ़ी और कार्यकर्ताओं के लिए वे राह आसान बना जाते हैं।
– मेरा मानना है कि यह संकलन किसी साहित्यकार ने तैयार किया होता तो वह शब्दों और भाषा का अच्छा संगम भर होता, मगर एक पत्रकार की लेखनी से लिखी दास्तां में वह पीड़ा भी सामने आई कि किन कारणों से शहर के समग्र विकास में बाधाएं सामने आईं।

-श्री पगारे ने अपनी खास शैली में साफ लिखा कि इटारसी सुधार न्यास का विघटन करने से नगर का विकास कैसे अवरुद्ध हुआ। और यह भी कि जिस भूमि का आने वाले 100 वर्षों तक कोई उपयोग नहीं वह रेलवे की हठधर्मिता से शहर के विकास में कोई काम नहीं आ रही। उन्होंने उस तकनीकी खामी का भी उल्लेख कर व्यवस्था पर सवालिया निशान लगाया कि आबादी में मात्र 400 लोग कम होने से किस तरह यह प्रगतिवान शहर शासन की अमृत योजना का लाभ नहीं उठा पाया।
इसके अलावा भी ‘संदर्भ इटारसी’ में ऐसी और भी बातों और जानकारियों का समावेश है जो काफी महत्वपूर्ण हैं। किताब में श्री पगारे ने एक-दो स्थान पर कहा कि हम अभी भी कई तथ्यों और बातों का उल्लेख नहीं कर पाए जो शायद और जरूरी हो सकते थे।
-बहरहाल इस किताब में शहर के साहित्यिक, राजनीतिक, सामाजिक जगत की सभी हस्तियों का जिक्र करने के साथ इतिहास और यहां के प्रमुख स्थानों का वर्णन करने के साथ चित्रों की अनुपम झांकी शहर के इतिहास की अनमोल धरोहर है।
– इस किताब के लिए जानकारी जुटाने और लेखन में उनकी टीम ने हरसंभव श्रमसाध्य प्रयास किए। खासकर नगर को अभिव्यक्ति देने हेतु एसडीएम श्री टी. प्रतीक राव द्वारा तैयार ‘लोगो’ और शहर की तमाम जानकारी देने वाली सभी शख्सियत भी सम्मान के अधिकारी हैं। यह किताब नई पीढ़ी को अपने शहर का ज्ञान देने के साथ इसकी जानकारी उन्हें प्रतियोगी परीक्षाओं में उपयोगी हो सकती है। इस कारण मैं साधिकार “संदर्भ इटारसी” को ग्रंथ कहना चाहूंगा, क्योंकि किसी अन्य शहर के बारे में अब तक ऐसी कोई किताब प्रकाशित होने की जानकारी मुझे नहीं है। इस ग्रंथ को तैयार करने वाली टीम को साधुवाद!
