प्रदीप शर्मा संपादक

याद है पिछली सदी में ब्रिटिश सत्ता से एक साथ आजाद हुए दक्षिण-एशिया के दो मुल्कों की व्यवस्था का कभी पश्चिमी मीडिया इस जैसी तस्वीरें जारी कर मजाक उड़ाता था। इसके पहले ब्रिटेन की ‘सिविल सेवा’ परीक्षा से चुनकर आए अधिकारियों का मिजाज भी कैसा था। मगर आजादी के बाद इन पदों के लिए सिविल सर्विसेज के स्थान पर शुरू केंद्रीय लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) और प्रदेश में (एमपी पीएससी) से चुनकर आए अधिकारियों का मिजाज नहीं बदला। किन्ही अधिकारियों को छोड़ दें तो उनका घमंड कभी कम नहीं दिखा। ये अफसर आमजन की समस्या जानना तो दूर, वे दूर से आती उनकी आवाज भी सुनना पसंद नहीं करते। ऐसे ही एक अधिकारी का घमंड गत दिवस तब चूर-चूर हुआ जब उन्होंने एक ड्राइवर से उसकी औकात पूछ ली।
गत दिवस मध्यप्रदेश के प्रशासनिक हल्के से आए एक ऐसे ही दिल दहलाने वाले मामले का वीडियो वायरल होते ही प्रदेश के मुख्यमंत्री डाॅ. मोहन यादव ने कार्यवाही कर अधिकारी को अपनी सीमा (औकात) बता दी।
– यहां ऐसे अधिकारियों को बता दें कि केंद्रीय लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) या प्रदेश लोक सेवा आयोग (एमपी पीएससी) का सीधा भावार्थ जनसेवा आयोग है। इसमें ‘जनसेवा’ के लिए इन्हें सेलेक्ट करने चुना गया है।
– यूं भी देश की अर्थव्यवस्था जिसके दम पर अफसरों और कर्मचारियों को मिलने वाला वेतन उसी गरीब की जेब से आए रिवेन्यू पर होता है। धूप में कड़ा पसीना बहाकर कमाने के बाद उसके द्वारा दिनचर्या के लिए खरीदी में तमाम टैक्स और जीएसटी चुकाए जाते हैं। इसलिए वे व्यवस्था के इन पालनहारों से उनकी औकात न पूछें।