#रोहिंग्या : आखिर कौन हैं वे लोग जो दर-दर भटक रहे
क्यों न यूएनओ और अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन भी ध्यान दें

-फोटो साभार –
रोहिंग्या आखिर हैं कौन, जिन्हें पहले वर्मा से खदेड़ा, फिर भटकते ये बांग्लादेश आ गए, अब वहां से भी पलायन कर उन्हें हिंदुस्तान में पनाह मांगनी पड़ रही है।
प्रदीप शर्मा संपादक हृदयभूमि।
सभी रीडर्स को समझाइश – यहां मैं साफ बता दूं कि मेरा मकसद किसी पक्ष की पैरवी करना नहीं,और न ही दूसरे किसी पक्ष को कमजोर करना है। यह बड़ी समस्या क्या है,
और इसका क्या निदान होना चाहिए,
बस यही बताना मेरा मकसद है।
तो दोस्तों इन दिनों हमारे दक्षिण एशिया उपमहाद्वीप में रोहिंग्या मुसलमानों के यहां-वहां पलायन से जो हालात विभिन्न स्थानों पर बन रहे हैं। लाजिमी है कि उससे चिंता हो।
माजरा क्या है दोस्त –
यह बात तो सभी जानते हैं कि अपने बीच किसी अजनबी के आने से कतिपय जगत में एक खौफ सा पैदा हो जाता है। यदि किसी देश, समाज या शहर में कोई अजनबी आ जाए तो सवाल पैदा होंगे ही, कि वह कौन है और कैसा है, क्यों आया है और यहां कब तक रहेगा। इसमें यदि सोशलाजी के साथ राजनीति भी जुड़ जाए तो यह करेला जिस पर नीम चढ़ने वाली बात होगी। यह सब एक सहज मानवीय स्वभाव की प्रक्रिया का ही अंग है। बहरहाल आप
जानें कि क्या है रोहिंग्या समस्या –
दरअसल इन दिनों एक ऐसे समुदाय के आने का देश भर में बवाल मचा है जिसे लड़ाकू किस्म का माना जाता है। हालांकि मुझे उनसे इसका कोई सरोकार नहीं।
मगर तय तो है कि हर जगह विरोध और प्रतिरोध होने का टकराव झेलने से पूरे समुदाय में आत्मसुरक्षा की वह भावना आ गई हो। जिसे हम लड़ाकापन कह सकते हैं।
बता दें कि इस विशेष कौम को पहले वर्मा से भगाया, फिर उन्होंने बांग्लादेश की शरण ली और अंततः वहां से भी खदेड़े जाने पर किसी तरह जान बचाकर भारत में प्रवेश करने लगे।
शायद राजनीतिक कारणों से यह जगह उनके लिए सुकून वाली हो सकती है। जी हां यह वही रोहिंग्या मुसलमान के नाम से पहचानी गई कौम है। जिसके आने से यहां *डेमोग्राफी चैंज* आने की आशंका है। वह इसलिए कि लगातार यहां-वहां बचने और झगड़ने के फेर में पूरा समुदाय आक्रामक और लड़ाकू सा दिखाई देता है। बताया जाता है कि ये रोहिंग्या मुसलमान शरणार्थी पश्चिम बंगाल, आसाम, पूर्वोत्तर भारत सहित उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश के इंदौर, देवास जिलों में भी बसकर अपने अंदाज में जी रहे हैं।
यह अलग बात है कि शरणार्थी मुल्कों में उनके प्रति वैसा आग्रह दिखाई नहीं देता, जैसा कि पाक-बांग्लादेश युद्ध के समय वहां से *इंडिया* आए शरणार्थी बांग्लादेशियों का यहां आतिथ्य स्वीकार हुआ।
इतिहास के झरोखे से रोहिंग्या –
दरअसल 1982 में बने म्यांमार राष्ट्रीयता क़ानून के तहत रोहिंग्या लोगों को म्यांमार में नागरिकता प्राप्त करने से प्रतिबन्धित किया गया है।
– ह्यूमन राइट्स वॉच के मुताबिक़ 1982 क़ानून ने प्रभावी तौर पर रोहिंग्या लोगों के लिए राष्ट्रीयता प्राप्त करने की कोई भी सम्भवता दूर की थी। जबकि म्यांमार में रोहिंग्या लोगों का इतिहास 8वीं सदी में शुरू हुआ था। इसके बावजूद इन्हें म्यांमारी क़ानून के आठ “राष्ट्रीय समूहों” में से वर्गीकृत नहीं किया गया। वे इस देश में अपने अधिकारों के लिए आंदोलन की स्वतंत्रता, राज्य शिक्षण प्राप्त करने और नागरिक सेवा में काम करने से भी प्रतिबन्धित हैं।
रंगभेद नीति का दोहराव-
यदि कहा जाए तो वह यह कि म्यांमार में रोहिंग्या लोगों की क़ानूनी अवस्था दक्षिण अफ़्रीका में रंगभेद नीति से ज्यादा अलग नहीं है, तो मेरा यह विचार उससे मेल है। मगर तमाम देशों की विदेश नीति और अन्यान्य कारणों से कोई भी मुल्क चाहे वह पड़ौसी हो या कोई और उसमें दखल नहीं देता।
भारत में क्या है हालात-
वर्तमान समय में यूं भी असम व अन्य राज्यों में घुसपैठियों की समस्या से देश उबर ही पा रहा था कि अब रोहिंग्या जैसी एक बड़ी समस्या सामने आ गई। इसका कारण यह है कि राजनीति में एक बड़े *डेमोग्राफिक* बदलाव से बड़े राजनीतिक दलों में बड़ा टकराव है। सो एक-दूसरे को पीछे छोड़ने के लिए ये दल उन बातों से भी समझौता करने लगे हैं, जो शायद मुल्क के हितों के लिहाज से ज्यादा ठीक नहीं।
क्या है इलाज-
समस्या का इलाज सिर्फ यह हो सकता है कि भारत सरकार अपने राजनीतिक, वैदेशिक संपर्कों का लाभ उठाकर वहां से भारत आए इन शरणार्थियों को वापस उनके मूल देश में पहुंचाएं। ताकि यहां के हालात न बिगड़ें।
–वहीं सोया हुआ अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग भी दखल देकर एक बड़ी मानव आबादी का कल्याण करे।
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