
प्रदीप शर्मा संपादक।
कुछ लोग खासकर विपक्षी राजनीतिक दलों के आलानेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी क्यों पसंद नहीं करते हैं। गत 75 साल के अधिक समय से देश मेंं भारतीय गणतंत्र राज कर रहा है। जबकि यहां डाॅ. भीमराव अंबेडकर द्वारा रचित संविधान सफलतापूर्वक कार्य करते हुए। साढ़े सात दशकों से सबसे बड़ी आबादी वाले देश में लोकतंत्र को जिंदा रखे हुए है। आपको बता दें इन सात दशकों में दुनिया के अनेक मुल्कों से लोकतंत्र की जड़ें उखड़ चुकी हैं। बस दुनिया में एक भारतवर्ष ही है जहां यह बखूबी कार्यरत है।
तब विपक्ष में ज्ञानी लोग थे-
बीते वर्षों की बात की जाए तो देश की संसद में मौजूद विपक्ष कभी भी वैचारिक दृष्टि से इतना हीन नजर नहीं आया। तब समाजवादी नेता डाॅ. राम मनोहर लोहिया और भारतीय जनसंघ से बलराज माधौक व कालांतर में अटलबिहारी वाजपेयी जैसे नेता विराजमान थे। उन्होंने देश में चाहे सत्तारूढ़ दल की नीतियों का विरोध किया हो मगर विदेश प्रवास दौरान कभी भी भारत सरकार की निंदा कर विदेशी मुल्कों से हस्तक्षेप करने की मांग नहीं की।
क्या हुआ एक दशक में –
मगर बीते इन वर्षों में मात्र 14 वर्ष का रिकॉर्ड देखा जाए तो विपक्ष के नेताओं द्वारा अपने देश में या विदेश में भारतीय प्रधानमंत्री के प्रति ऐसी भाषा का उपयोग किया जाता है। जो इसके पूर्व के बीते वर्षों शायद पहले कभी देखने को नहीं मिला, तो शायद विपक्ष में राजनीति का मिजाज ठीक नहीं है।
वहीं दूसरी ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के विपक्ष पर चुटकियां तो लेते हैं/ किंतु उन्होंने भाषा की मर्यादा को कभी भी और कहीं भी नहीं खोया।
फिर अचानक ये बदलाव कैसे आया –
दरअसल एक वोट को अपना बैंक मानने वाली पार्टी ने गुजरात में नरेंद्र मोदी का जलवा देखकर उसे तुक्का मान लिया। मगर अटल जी के बाद जब उन्हें प्रधानमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट किया तो विपक्ष यह मान बैठा कि ताश का यह पत्ता काम नहीं आएगा। मगर मोदी ने बड़ी जीत हासिल की।
फिर दोबारा भी वही हुआ –
इसके बाद 2019 में चुनाव आने तक मोदी ने वह सब करके दिखाया, जिनका विपक्ष हमेशा मजाक बनाता था। नतीजन इस चुनाव में भी लगातार दूसरी बार जीतकर भाजपा ने विपक्ष के हौसले ठंडे कर कर दिए।
तीसरी पारी से होश गंवा दिए –
फिर राम मंदिर बनने और ऐसे अनेक कार्यों के बाद मोदी की तीसरी पारी तय थी, मगर तब तक महान विश्लेषकों ने समझकर ज्ञान दे दिया कि थोक तो पास में है ही, केवल इस बार बड़े वोटबैंक को बिखरा कर काम करना है। नतीजा सामने है। कि मोदी सरकार अनेक फैसले शायद न ले पाए जो उनके वादे थे।
फिर भी खीज नहीं गई –
मोदी की तीसरी पारी बाद विपक्ष के बड़े नेताओं शायद नेता प्रतिपक्ष हैं उनकी खीज नहीं गई। -सबसे पहले तो यह कि जिस पद पर उनको आने की तमन्ना है, वे उस पद का सम्मान नहीं करते।
न तो पद के लिहाज से
और न ही उम्र के मान से/
भाषा की तमीज भी सड़कछाप बच्चा, जो कोई भी किसी बुजुर्ग के बारे में उपयोग न करे।
-सम्मान न मिलने की वजह ?
जब भारतवर्ष के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विदेश प्रवास पर जाते हैं तब विदेशी मुल्क का एक राष्ट्रपति उनके चरण स्पर्श करे तो यह हमारे देश का सम्मान है। मगर कुछ लोगों को नहीं भाता है।