May 27, 2026 |

पापुलर वोट में जीत मगर अभी दूर है मंज़िल

47 वां राष्ट्रपति बनने अभी ट्रंफ को करना होगा इंतजार

Hriday Bhoomi 24

प्रदीप शर्मा संपादक हृदयभूमि।

अमेरिका के 47 वें राष्ट्रपति चुनाव में हुई पापुलर वोटिंग दौरान निर्णायक जीत मिलने के बावजूद अभी रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंफ को व्हाईट हाॅउस तक पहुंचने के लिए कुछ दिनों तक और इंतजार करना होगा। राजनीति विज्ञान के विद्यार्थी अच्छी तरह जानते हैं यहां की चुनाव प्रणाली इतनी जटिल है कि पापुलर वोट पाने के बावजूद इलेक्टोरल वोटिंग में बाजी पलट जाती है। इस बात का गवाह अमेरिका के पिछले कुछ चुनाव हैं। जिसमें ऐन मौके पर बड़े उलटफेर हो गए।

इलेक्टोरल वोटिंग में बदले नतीजे-

-ऐसा हाल ही में 2016 के चुनाव में भी हुआ था, जब डोनाल्ड ट्रंप ने हिलेरी क्लिंटन को इलेक्टोरल वोट में हराया, जबकि हिलेरी ने पॉपुलर वोट में ज्यादा वोट हासिल किए थे।

-इसी तरह 2000 में भी जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने पॉपुलर वोट में हारने के बावजूद अल गोर को इलेक्टोरल वोट में हराकर चुनाव जीता था।

-2016 में ट्रंप की प्रतिद्वंद्वी डेमोक्रेट प्रत्याशी हिलेरी क्लिंटन ने करीब 3 मिलियन ज्यादा पॉपुलर वोट हासिल करने के बावजूद ट्रंप 306 इलेक्टोरल कॉलेज वोट जीतने में कामयाब हुए और उन्होंने जीत हासिल कर ली।

बहरहाल फिलवक्त अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनावी रुझान में रिपब्लिकन प्रत्याशी डोनाल्ड ट्रंप अपने विरोधी दल डेमोक्रेट पार्टी की उम्मीदवार कमला हैरिस से आगे निकल गए हैं। मगर पापुलर वोटिंग के बाद असली फैसला इलेक्टोरल वोटिंग से होगा।  

अमेरिकी राष्ट्रपति की जटिल चुनाव प्रक्रिया-

अमेरिका में राष्ट्रपति के चुनाव दो तरह की वोटिंग पॉपुलर और इलेक्टोरल वोटिंग से होते हैं। इसमें अंतिम नतीजे इलेक्टोरल वोटिंग से तय होते हैं। यह कई बार पापुलर वोटिंग के नतीजों को बदल भी सकती है।

चुनावी हार-जीत का ढंग-

यहां पॉपुलर वोटिंग से पता चलता है कि जनता ने किस उम्मीदवार का समर्थन किया है। यह वोटिंग इलेक्टोरल वोट के निर्धारण में भूमिका निभाती है। प्रत्येक राज्य का एक निश्चित संख्या में इलेक्ट्रोरल वोट होता है और अधिकांश राज्यों में विनर-टेक्स-ऑल प्रणाली लागू होती है। यानी जिस उम्मीदवार को पॉपुलर वोट में सबसे ज्यादा वोट मिले, उसे उस राज्य के सभी इलेक्ट्रोरल वोट मिल जाते हैं।  

कैसा होता है स्विंग स्टेट?

अमेरिका में वेटेज वोटिंग सिस्टम के जरिए राष्ट्रपति तय होता है। इसे इलेक्टोरल कॉलेज के रूप में जाना जाता है। न कि पॉपुलर वोट द्वारा इस वजह से स्विंग स्टेट नतीजे तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं। स्विंग स्टेट वे माने जाते हैं जो किसी निश्चित ट्रेंड का पालन नहीं करते, बल्कि बार-बार बदलते हैं। आखिरकार जीत में निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
यहां 7 राज्यों का स्विंग स्टेट है। इनमें नेवादा (6), एरिजोना (11), नॉर्थ कैरोलिना (16), जॉर्जिया (16), विस्कॉन्सिन (10), मिशिगन (15) और पेंसिल्वेनिया (19) का नाम शामिल है। ऐसे में कैंडिडेट्स को इन बड़े स्विंग स्टेट पर ज्यादा फोकस करना पड़ता है.

भारतीय चुनाव प्रणाली से अलग है-

अमेरिका अपनी स्थापना के बाद से ही राष्ट्रपति चुनाव में इलेक्टोरल कॉलेज का इस्तेमाल करता आ रहा है। अर्थात लोग अप्रत्यक्ष रूप से अपने राष्ट्रपति का चुनाव करते हैं। इसे भारत की चुनाव प्रक्रिया के लिहाज से समझें तो जैसे हमारे यहां वोटर्स विधानसभा या लोकसभा चुनाव के जरिए विधायक या सांसद चुनते हैं । बाद में यही विधायक या सांसद मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री चुन लेते हैं। लेकिन अमेरिका पूरी प्रक्रिया थोड़ा जटिल है।

आगे क्या होगा –

राष्ट्रपति चुनाव में पापुलर वोटिंग के बाद इलेक्ट्रोरल कॉलेज के सभी इलेक्ट्रर्स 17 दिसंबर को अपने राज्यों की राजधानी में आएंगे। यहां वे औपचारिक रूप से अगले अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए वोट डालेंगे। राष्ट्रपति चुनाव के पॉपुलर वोट में जो उम्मीदवार उस राज्य में जीता है, उसके पक्ष में सभी इलेक्ट्रर्स को वोट देने की उम्मीद की जाती है। इलेक्ट्रर्स पहले से ही उस राजनीतिक दल द्वारा चुने होते हैं, जो चुनाव में अपने उम्मीदवार का समर्थन करते हैं। कुछ राज्यों में इलेक्ट्रर्स को कानून द्वारा अपने उम्मीदवार को वोट देने के लिए बाध्य किया गया है। वहीं कुछ राज्यों में यह अपेक्षित होता है लेकिन बाध्यकारी नहीं।

6 जनवरी को आएंगे अंतिम परिणाम

6 जनवरी 2025 को अमेरिकी कांग्रेस की बैठक होगी और वोटों की गिनती की जाएगी। उसके बाद विजेता का नाम घोषित किया जाएगा। उसके बाद 20 जनवरी को नए राष्ट्रपति शपथ लेंगे।


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