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प्रदीप शर्मा सीनियर जर्नलिस्ट हरदा।
अच्छा हुआ किसी वैचारिक टटपूंजिए ने टिप्पणी कर सनातन की हवा और तेज कर दी है। हमेशा देश, दुनिया और समाज में शांत, सौहार्द्र बने रहने वाले सनातनी खून में इससे उबाल तो आया।
– वैदिक काल के ग्रंथों में जिस सनातन धर्म का उल्लेख मिलता है उसका सीधा-सीधा अर्थ ‘सदैव रहने’ वाला है। न इसका कोई आदि है और न ही इसका अंत। ज्ञात जानकारियों के अनुसार इसका रिकार्ड 12 हजार साल पुराना और पौराणिक आख्यानों पर जाएं तो यह 90 हजार साल पुराना है। कालांतर में इससे निकली अनेक शाखाएं विभिन्न धर्म के रूप में साथ-साथ चली और कुछ विलग होकर अपने-अपने अस्तित्व को बनाने में लगी रही।
-इस दौरान आर्यावृत्त आए आक्रमणकारियों ने इसे नेस्तनाबूद करने का प्रयास किया मगर कुछ समय राज करके वे खुद ही मिट गए इस जहां से।
-विश्व धर्म सम्मेलन शिकागो में स्वामी विवेकानंद ने यही संदेश देकर सारी दुनिया को बताया कि भारतवर्ष संपेरों और मदारियों का देश नहीं। देश पर सदियों तक राज करने की मंशा से यहां आए फिरंगियों के शिक्षाविद लाॅर्ड मैकाले ने भी कहा था कि इस देश के लोगों को शिक्षा देने की जरूरत नहीं है क्योंकि यहां के मंदिरों में ज्ञान का विपुल भंडार है। इसलिए पहले मंदिरों और गुरूकुलों की शिक्षा बंद की जाए।
-तक्षशिला और नालंदा के जिन विश्वविद्यालयों को चकनाचूर कर वहां की लायब्रेरी में आग लगाने वाले मुगल शासक भी हैरान थे कि छह माह तक लगातार जलने के बावजूद इस आग का धुआं खत्म नहीं हुआ। आज देश, समाज और दुनिया के पास जिस ज्ञान की थाती है वह सनातन की देन है। आज पूरी दुनिया यह बात अच्छी तरह जानती है कि “विश्व वसुधैव कुटुम्बकम” हमारी विचारधारा है। हमने तलवारों से नहीं ज्ञान से दुनिया को अपना बनाया है।
– वैश्विक इतिहास भी इस बात का गवाह है कि आज दुनिया की तमाम सभ्यता मिट गई हैं मगर सनातन आज भी विद्यमान है। मशहूर शायर इकबाल ने कहा है – यूनानो, रोमां और मिस्रां मिट गए जहां से/मगर फिर भी बाकी है नामों निशां हमारा।
