पत्रकारिता पार्ट-2 : सच्चाई जब निकलेगी गले को फाड़, मुंह छिपाएंगे घराने
अब आएगा मजा जब कलम तोड़कर होगा बखान

प्रदीप शर्मा संपादक।
पत्रकारिता में मिली पीड़ा को इस पार्ट-2 में बता रहे हैं कि जब सच्चाई निकलेगी गले को फाड़, मुंह छिपाते फिरेंगे ये सारे घराने।
देश मेंं आजादी के बाद पत्रकारिता का दौर किस कदर चला है। बता दें आपको कि यहां न मुंह में दाने हैं और चले हैंं, समाजसेवा कराने। याद करना इसी जमाने मेंं इटारसी शहर में एक सीधे-सादे पत्रकार थे। उनका नाम था जवाहर सिंह पंवार। वे एक नामी समाचार एजेंसी के प्रतिनिधि थे।
वे आजीवन कंधे पर झोला टांगे, अपने साथ में कलम -डायरी लिए टायर की चप्पल पहने घर से निकलते थे तो उनके चरण छूने वालों की लाईन लगती थी। पत्रकार वार्ता में भी उनके सवालों का जवाब देने में अधिकारी और नेता बगलें झांकते थे। उस पीढ़ी के और भी पत्रकार इटारसी में जिंदा हैं और अपनी मर्यादित परंपरा को निभा रहे हैं।
मगर इस जीवन संघर्ष में इन्हें क्या मिल रहा है। यही सवाल हरदा, खंडवा, बैतूल और खरगौन क्षेत्र ही नहीं बल्कि संपूर्ण देश के तमाम लोगों से है। तो कभी सोचा है कि जनहित की खातिर निस्वार्थ लड़ जाने वाले इन पत्रकारों को क्या मिला। कुछ भी नहीं वे आज भी अपने टायर की चप्पल घिसते आपको यहां-वहां जनता के दुख-दर्द ढूंढते मिल जाएंगे। वे अगर मिल जाएं तो सम्मान से नमस्कार जरूर करना।
कभी पत्रकारों जो अपने आसपास दिख जाएं।
अगली पोस्ट में हम बताएंगे कि कितने संघर्ष से जीते हैं मीडिया जगत के लोग। इसे याद से पढ़ना ताकि आंखें खुल जाएं। पत्रकारिता में इच्छुक साथीगण जुड़ें हमारे साथ।
मिलते हैं अगली पोस्ट में तब तक के लिए नमस्कार आदाब और सलाम।
अगली पोस्ट देखना और पढ़ना न भूलें।
