स्वामी रामभद्राचार्य : जिनकी गवाही से सुप्रीम कोर्ट के जज भी चकित हुए
दो माह की उम्र में अपनी नेत्र ज्योति गंवा चुके थे संतश्री

– हृदयभूमि विचार –
वर्ष 2024 का नया साल हिंदू मतावलंबियों के खुशियों की बड़ी बारात लेकर आ रहा है। लगभग 6-7 सौ वर्षों के संघर्ष और हजारों कुर्बानियों के बाद वर्तमान पीढ़ी को उस घड़ी का इंतजार है – जब रामलला अपने जन्मधाम में विराजेंगे। आगामी वर्ष 2024 की 22 जनवरी को भव्य समारोह दौरान देश-विदेश की विभिन्न हस्तियों के बीच जब रामलला की मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा होगी तब संपूर्ण देश में हिंदूमतावलंबी यह दिन दिवाली की तरह मनाएंगे। इसके लिए 1 जनवरी से ही बड़े आयोजनों का सिलसिला पूरे देश में शुरू हो जाएगा।
जब रामलला अपने धाम में विराजित होने जा रहे हों, तब बड़ी हस्तियों के बीच उस महान संत को भला हम कैसे भुला सकते हैं, जिनकी अनमोल गवाही रामजन्मभूमि मामले का सबसे बड़ा टर्निंग पाॅइंट बनी थी। यह महान शख्सियत थी चित्रकूट में तुलसीपीठ के पीठाधीश्वर जगतगुरू स्वामी रामभद्राचार्य जी। रामजन्मभूमि मामले में नेत्रज्योतिहीन स्वामी रामभद्राचार्य की गवाही के समय उनके सामने बावरी मस्जिद कमेटी की ओर से तमाम सवालों की बौछार लगाने वाले वकीलों की फौज थी। और उसपर विचार कर फैसला सुनानेवाले विद्वान जजों की एक पीठ भी थी।
- इस ऐतिहासिक गवाही के दौरान जब उनसे रामजन्मभूमि स्थान के बारे में सवाल पूछकर वकीलों ने उन्हें सुलझाना चाहा तो अदभुत मेघाशक्ति के धनी रामभद्राचार्य ने वेदों की एक संहिता में लिखित वर्णन को श्लोक दर श्लोक सुनाते हुए कहा कि इन ग्रंथों के अनुसार सरयू नदी के तट पर अमुक दिशा में अमुक स्थान पर रामलला का जन्म हुआ था। तो जजों ने उस संहिता को बुलवाकर देखा तो पता चला कि संतश्री की मुखजुबानी गवाही अक्षरशः सत्य है। इस गवाही को सुनकर सुप्रीम कोर्ट के मुस्लिम जज भी चकित हो उठे थे।
इसके बाद उनकी गवाही के आधार पर जब पुरातत्व विभाग की टीम को भेजकर खनन व जांच कराई तो टीम को वहां राममंदिर होने के अनेक प्रमाण मिले।
स्वामी रामभद्राचार्य यूं तो दो वर्ष की आयु में अपनी नेत्रज्योति खो चुके थे। मगर उन्होंने बिना किसी ब्रेललिपि का सहारा लिए तमाम शिक्षा प्राप्त की। उन्हें 22 भाषाओं का ज्ञान होने के साथ उन्होंने चार भाषाओं में लगभग 80 ग्रंथों की रचना की। जीवन में उन्हें भारत सरकार द्वारा पद्मविभूषण की उपाधि से सम्मानित किया गया है। इसके अतिरिक्त भी उन्हें अनेक सम्मान मिले हैं। स्वामी जी ने चित्रकूट में तुलसीपस्वामी जी ने चित्रकूट में तुलसीपीठ की स्ठस्वामी जी ने चित्रकूट में तुलसीपीठ की स्थापना भी की, जहां तुलसीदास जी ने रामचरितमानस की रचना की थी।
