
(फोटो साभार)
प्रदीप शर्मा संपादक।
‘फिर वही धूप है, फिर वही रात है…’ ये किसी नगमे की पंक्ति नहीं बल्कि बदलती वैश्विक राजनीति की वो दास्तां है, जो अब हर मुल्क के राजनीतिक रुपहले पर्दे पर दिखाई जा रही है।
– जी हां मैं चर्चा करने जा रहा हूं राजनीति की उस दूषित कहानी की जो मानव-धर्म को धकेलकर मीलों दूर जा रही है। इसमें हम और आप एक कतरे भर हैं।
-याद है आपको हमारे भारत वर्ष के लोकसभा और विधानसभा चुनावों में यहां किस तरह सामाजिक और धार्मिक विचारों का बड़ा सैलाब आ जाता है। इसके बाद वे सब सुप्त हो जाते हैं, अन्यथा बाद में बड़ा बदलाव आ जाता।
-बहरहाल हम भारत को छोड़कर चर्चा कर रहे हैं अमेरिका की, जहां भी यह खतरनाक राजनीतिक बीमारी आ गई है। अब यहां की राजनीति का रंग भी उसी तरह स्याह हो गया है, जहां कभी मान्यताओं के आधार पर भेद-विभेद नहीं थे।
-सभी को पता है गोरों और कालों के मिश्रित देश मेंं पहले की चुनाव जंग किस तरह लड़ी जाती थी। मगर “यूएसए” की राजनीति में धीरे-धीरे वह बदलाव आया कि बीते एक दशक पूर्व वहां का राष्ट्राध्यक्ष ‘बराक ओबामा’ को चुना गया। जबकि यहां ये दोनों रंग एक दूसरे के घोर विरोधी रहे हैं।
एक ओर बड़ा परिवर्तन –
“इसके बाद वहां के हालात में और भी बड़ा सा बदलाव आ गया है। अब यहां एशियाई मुल्कों और खासकर भारतवर्ष से पहुंचे “एनआरआई” की इतनी बड़ी तादाद है कि चुनाव में उन्हें लुभाने के लिए नेतागण यह नया काॅर्ड भी खेल सकते हैं।
-तो दोस्तों इस बार शायद अमेरिकी राष्ट्रपति का यह पहला आमसभा चुनाव होगा, जहां के मतदाताओं में भारतीय नस्ल के लोगों और खासकर 0.7 से 1 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखने वाले हिंदूवोटों पर सबकी निगाह है। यहां के गत चुनाव में इससे भी कम प्रतिशत मतों के अंतर से ट्रंप को हार मिली थी।
इसलिए सबको बधाई क्योंकि अब आप विश्व की महाशक्ति अमेरिका के राष्ट्रपति का भी चुनाव करने जा रहे हैं।