…वो कौन थे जिन्हें मेरे हालात पर रोना आया होगा
स्ट्रीट लाइट की इन टिमटिमाती सड़कों पर किसने प्रेम का पाठ पढ़ाया होगा

प्रदीप शर्मा संपादक
“वो कौन थे जिन्हें मेरे हालात पर रोना आया होगा।”।
किसी शायर की इन अमर पंक्तियों को मौजूं करते हुए यह नाचीज भी, अपने वीराने से जीवन और अफसाने को बताना चाहता है, जो यूं तो दिखता है सदाबहार मगर इसके पतझड़ की बेला सामने है। सादर क्षमा याचना सहित इस शायरी को मोड़ देते हुए “कुछ इस तरह बयां हैं अल्फाज़ मेरे/”
“न मैं था यहां, न तुम थे वहां, फिर किसने मेरे दिल का टूटा साज बजाया होगा/
टिमटिमाती स्ट्रीट लाइट की घनघोर रातों में,
वो कौन था जिसने मुझे प्रेम का पाठ पढ़ाया होगा/
दर्द भरे इस अफसाने में वो कौन होंगे जिन्होंने प्यार से मुझे सहलाया था,
न तुम थे, न वो कोई और, जरूर इन्ही हवाओं ने मुझे सहलाया होगा”
नामालूम मुझे कि वो लोग कौन थे,
जिन्हें मेरे हालात पर रोना आया होगा/
हां बरसों से कर रहा था इंतजार जिसका,
लगता है वही शातिर आज याद आया होगा”
इस छोटे से मुशायरे में कभी कोई गलती हो जाए दोस्त तो बस यही कहना है हमारा-
“कसम न हम खाते हैं, और न खाई जाती है ये खुदाई/
बस दिलों में अरमानों का टोकरा लिए हम घूमते हैं कमबख़्त उस प्यार की खातिर।”