
हृदयभूमि, हरदा।
प्रिय पाठकों, अभी तक आपने अनेक महान लेखकों की प्रकाशित रचनाएं/कहानी और कविताएं विभिन्न स्थानों पर देखी और पढ़ी होंगी। मगर हमारे आसपास भी ऐसे कुछ युवा गुमनाम लेखक, कवि-शायर हैं, जिन्हें बड़े प्रकाशनों में स्थान नहीं मिल पाया। यदि कभी आपको इनकी रचनाएं, विचार और कविता-शायरी देखने और पढ़ने को मिल जाए तो शायद आप इन्हें सराहे बिना नहीं रहेंगे।
इस विचार के साथ हम अपने जिले हरदा के एक घूमंतु लेखक राकेश यादव गोल्डी से परिचय कराना चाह रहे हैं, जिनका मौलिक चिंतन हमें कहीं झकझोर देता है। इस क्रम को शुरू करने के पूर्व अभी पढ़ें राकेश यादव गोल्डी का परिचय उन्हीं की जुबानी –
*”मेरी अपनी कब्र” –
15 सालों का सफर, हजारों कहानियाँ!
– राकेश यादव गोल्डी
यह कोई आम कब्र नहीं, बल्कि समाज, युवाओं, संस्थाओं, और बदलाव के अनुभवों से बनी दास्तान है। 2000+ लेख, 4000+ कविताएँ, 700+ युवाओ की कहानी जो संस्थाओं से जुड़ी और 27 अधूरी किताबें… जल्द ही पढ़िए मेरे जीवन के अनकहे पहलू! #युवाओं की आवाज़ #मेरी अपनी कब्र
*अगामी लेख जल्द आपके बीच*
हर पारदर्शिता, मौलिकता और अप्कीमौलिकता और अप्रकाशित होने की जिम्मेदारी हमारी अपनी।
तो पाठकों आपको प्रति सोमवार पढ़ने को मिलेंगे राकेश जी के सामयिक #लेख, विचार और कविताएं शायरी इसी जगह…
आज रविवार को उनकी पहली रचना
*मरने के बाद* –
.::. राकेश यादव गोल्डी
सांस थम गई, धड़कन रुक गई, मरने के बाद,
रूह ने जिस्म को अलविदा कह दी, मरने के बाद।
दुनिया ने रोते हुए कंधा दिया, मरने के बाद,
जो कभी न पुकारा उन्होंने पुकारा, मरने के बाद।
जो आंखें फेर कर चलते थे, रुके वही लोग, मरने के बाद,
नफरत के पहरे टूट गए सबके, मरने के बाद।
बातें जो अनसुनी रह गई थीं, गूंज उठीं, मरने के बाद,
ख्वाब जो अधूरे थे, पूरे से लगे, मरने के बाद।
अपने-पराये सब गले मिलने आए, मरने के बाद,
जो कंधा देने से कतराते थे, आगे बढ़े, मरने के बाद।
जिनसे उम्मीद ना थी सहारे की, वही थामे खड़े थे, मरने के बाद,
जो गिले-शिकवे थे दिल में दबे, सब बह निकले, मरने के बाद।
दुश्मनों ने भी चुपके से सिर झुकाया, मरने के बाद,
किसी ने फूल चढ़ाए, किसी ने दुआ मांगी, मरने के बाद।
जिंदगी की उलझनों का हिसाब सुलझा, मरने के बाद,
दिल की कड़वाहटों का बोझ उतर गया, मरने के बाद।
वक्त ने जो ताने दिए थे, सब वापस लिए, मरने के बाद,
सच्चाई ने खुद को आईने में देखा, मरने के बाद।
मिट्टी में लिपट कर भी रूह मुस्कुराई, मरने के बाद,
असली सफर तो तब शुरू हुआ, मरने के बाद।
