
प्रदीप शर्मा हृदयभूमि।
इंदौर में एक अति-उत्साही बैट्समैन युवा नेता के पिताश्री से क्या उम्मीदें बांधी जाएं जो एक जिम्मेदार जनप्रतिनिधि और प्रदेश सरकार के वरिष्ठ मंत्री भी हैं। विगत दिवस यह अच्छा ही हुआ कि जनहित संबंधी सवाल करने पर उन्होंने केवल घंटा ही उठाया, यदि वे बल्ला लेकर मीडिया प्रतिनिधि के पीछे लपक पड़ते तो उन्हें कौन रोकता।
क्या होता इसके फेर न पड़ते हुए हम चर्चा करेंगे कि इसके भावार्थ क्या हैं।
क्या है मामला –
मामला यह है कि स्वच्छता के लिए देश भर में विख्यात इंदौर में नगर निगम द्वारा सबसे जल सेवा में कथित लापरवाही से कुछ मौत होने पर दूषित पानी का सवाल पर जिम्मेदार प्रदेश सरकार के वरिष्ठ मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने मीडिया प्रतिनिधि को न केवल टका सा जवाब दिया बल्कि (घंटा जैसे) अशोभनीय शब्दों का इस्तेमाल कर मीडिया को अपमानित करने का प्रयास किया।
दकियानूसी सोच –
दरअसल बीते कुछ समय से विपक्ष में बैठी एक अन्य पार्टी के नेतागण भी मीडिया को अपमानित करने का प्रयास करते आए हैं। वहीं गत डेढ़ दशक से सत्ता में बैठी पार्टी के जिम्मेदार जनप्रतिनिधि भी अब मीडिया के साथ ऐसी भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं तो इसके क्या अर्थ लगाएं। अभी तो यहां सरकार बदलने या कठिन चुनावी संघर्ष जैसे कोई हालात भी नहीं है। तब बेमौसम ही मंत्री जी की जुबां फिसली, या सत्ता के मद में चूर नेता का बयान है।
यह सवाल पूछता है लोकतांत्रिक देश भारतवर्ष का चौथा स्तंभ। क्योंकि यह बैट्समैन वाले नेताओं का नहीं सीधी लाठी टेकते महात्मा गांधी का भारतवर्ष है।
