
(फाइल फोटो)
प्रदीप शर्मा संपादक :
रंग बदलती इस दुनिया में इंसान की सूरत ठीक नहीं/ राजनीति में निकला न करो यूं सज-धज कर किसी का कोई भरोसा नहीं।
इसे कहावत कहें या किसी फिल्मी गीत का मिक्सअप जुमला मगर कब कहां क्या हो जाए, कुछ भी कहना मुश्किल है। खास तौर पर बिहार की राजनीति मेंं जो सिलसिला आधुनिक समाजवादी नेताओं के जमाने में शुरू हुआ है। उसकी बात ही निराली है।

चर्चा में आखिर क्यों है बिहार –
महान नेताओं की जननी इस भूमि पर समग्र क्रांति का नारा देकर केंद्र की सत्ता हिला देने वाले लोकनायक जय प्रकाश नारायण के बाद उनके अनुयायी नेताओं ने राजनीति और विचारधारा को ताक पर रखकर जिस तरह कुर्सी को महत्ता दे रखी है, उससे राजनीति के सारे सिद्धांत ही शर्मसार हो गए।
सिद्धांत गए भाड़ में कुर्सी आए –
खासतौर पर पिछले डेढ़-दो दशक की राजनीति देखें तो पता चलता है कि अब राजनीतिक दल सत्ता पाने के गिरोह भर बनकर रह गए हैं। यहां नेताओं को न नीतियों से कुछ लेना-देना और न ही उन्हें सिद्धांतों से कोई सरोकार। इस कारण राजनीतिक तराजू का मेंढक कब किस पलड़े में बैठ जाए कहना संभव नहीं।
अब जन सुराज का क्या –
राजनीति के स्पेशलिस्ट एवं पहली बार मैदान में उतर रहे नए-नवेले नेता प्रशांत किशोर ने गौतम बुद्ध की उस पावन भूमि पर जन सुराज नामक पार्टी की बुनियाद रखकर सोए हुए जन-समुदाय को जगाने का जतन शुरू किया है। यदि इस जमाने की पढ़ी-लिखी आबादी कुछ परिवर्तन लेकर आई तो राजनीति में ऐसे पलटूरामों का सफाया हो सकता है, जिन्होंने नीतियों को नीतियों को तिलांजलि देकर जनता के विश्वास को ठेस पहुंचाई है। अन्यथा उलटबांसी का खेल आगे भी जारी रहेगा।
